आज के आधुनिक युग में भी बच्चों संग दातून बेचकर गुजारा कर रहे हैं बिरहोर

मयूरहंड(चतरा)हिमांशु सिंह। सरकार के लाख प्रयाश के बाबजूद इस आधुनिक युग में भी चतरा जिले के मयूरहंड प्रखंड के करमा बिरहोर टोला में निवास करने वाले आदिम जनजाति (बिरहोर) अपने बच्चों संग दातून बेचकर गुजारा करने को मजबूर हैं। करमा बिरहोर टोले में लगभग चालीस परिवार निवास करते हैं। ज्ञात हो कि सरकार द्वारा प्रति वर्ष आदिम जनजाति के उत्थान व विकास को लेकर कारोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। लेकिन बिरहोर परिवारों के जीवन यापन के तरीके में सुधार नहीं हो पाया है। साप्तहिक बाजार में अपने बच्चों संग दांतुन व जड़ी बूटी बेच रहे प्रवीण बिरहोर, आरती बिरहोरिन, मुनी बिरहोरिन, बुधनी बिरहोरिन से पूछा गया तो बताया कि सरकार सिर्फ चावल देता है, नमक तेल व कपड़ा आदि के लिए जंगल से जड़ी-बूटी और दातून बेचकर जुगाड़ करते हैं। बिरहोरों ने बताया कि परिवार के सदस्यों का आज तक जाॅब कार्ड नहीं बना है। वहीं बिरहोर परिवारों के जीवन शैली देखने से प्रतित होता है कि सरकार द्वारा मिलने वाली सुविधाएं कहीं ना कहीं उन तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं और सरकार बिना स्थलीय प्रमाणिकता के अपनी उपलब्धि गिनाते नहीं थकती। बिरहोर परिवार जिस आवास में रह रहे हैं वो 1990 में कल्याण विभाग द्वारा बनाया गया है, जो काफी जर्जर हो चुका है। लेकिन इस ओर ना हीं सरकार या सरकारी तंत्र का ध्यान है। पीएचडी विभाग द्वारा अधिष्ठापित सोलर संचालित पंप भी कई माह से खराब पड़ा है। शौचालय की भी स्थित बिरहोर टोले में बदतर है, लगभग शौचालय अधुरे हैं। यहा बच्चों के शिक्षा की स्थिति भी कागजों तक सिमटकर रह गई है। लगभग बिरहोर बच्चे अपने परिजनों के साथ जंगल जाते हैं और बाजारों में दातून आदि बेचने, लेकिन इसे देखने वाला कोई नही है।