स्वतंत्रता सेनानी स्व0 राम अवतार राम की स्वतंत्रता दिलाने में रहा महत्वपूर्ण योगदान

गढ़वा से नित्यानंद दुबे की रिपोर्ट

गढ़वा : आजादी के 75वें वर्षगांठ “आजादी के अमृत महोत्सव (AKAM)” के रूप में मनाया जा रहा है। गढ़वा जिला के स्वतंत्रता सेनानियों का स्वतंत्रता आंदोलन में दिए योगदान के बारे में आम लोगों को जनाना चाहिए ताकि हम उनके बताये पथ पर अग्रसर हो सकें। स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय राम अवतार राम की जीवनी व स्वतंत्रता संग्राम में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इनका जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय त्रिवेणी राम एवं माता का नाम स्वर्गीय परमेश्वरी देवी था। ये तीन भाईयों एवं एक बहन में सबसे बड़े थें। इनका जन्म नाना के घर डालटेनगंज (धोबी मोहल्ला) में दिनांक 1 जनवरी 1929 को हुआ था। इन्होंने जिला हाई स्कूल डालटेनगंज से 9वीं की कक्षा तक शिक्षा ग्रहण किया। जिला हाई स्कूल में छात्र संघ के अध्यक्ष थें। पढ़ाई काल में ही अंग्रेजों के जुल्म के खिलाफ उन्होंने अपने दो दोस्तों स्वर्गीय पूर्ण चंद एवं यदु बाबू के साथ मिलकर एक अंग्रेज अधिकारी को माथा फोड़ दिए थें एवं बहुत दिनों तक जंगल में छिप कर रहे । सन 1942 ईस्वी में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय राम अवतार राम को धारा 17(1) डी0आई0आर0 के तहत दिनांक 5 सितम्बर 1942 से 18 सितम्बर 1942 तक मंडलकारा डाल्टनगंज में रखने के बाद हजारीबाग केंद्रीय कारा में भेज दिया गया। इन्हें क्षमा का सश्रम कारावास एवं ₹25 जुर्माना लगाकर मुक्त किया गया। आजादी के बाद भी इनके द्वारा जमींदारों के द्वारा शोषण किये जाने के विरुद्ध आंदोलन किया गया। कई सामाजिक कार्यों में इनके द्वारा भाग लिया गया। वर्ष 1966 ईस्वी में ग्राम पंचायत पिपरी कला के मुखिया पद पर निर्वाचित हुए एवं जनता की सेवा की। सन 1967 ईस्वी के आकाल में भी इनके द्वारा बढ़-चढ़कर लोगों की सहायता की गई। स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में भाग लिया एवं जेल गए। सामाजिक कार्यों में अपना नगर उंटारी एवं डालटेनगंज का आवास भी बेच दिया। सन 1972 ईस्वी में इन्हें स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ। मृत्यु पर्यन्त ये समाज एवं गरीबों की सहायता करते रहे। सरकार द्वारा इन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पेंशन भी दिया जाता था। इनकी मृत्यु उनके पैतृक गांव पिपरी कला में दिनांक 30 दिसंबर 2016 को हुआ। उनके अंतिम संस्कार में जिला के कई वरीय पदाधिकारियों की उपस्थिति रही। अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ ग्राम पिपरी कला के बाकी नदी के तट पर किया गया। इन के चार पुत्र एवं 6 पुत्रियां हैं।

स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय विष्णु प्रसाद सिंह की जीवनी व स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान
इनका जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम स्वर्गीय हित नारायण सिंह एवं माता का नाम विंध्याचल कुंवर था। ये अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थें। इनका जन्म दिनांक 25 जनवरी 1923 ईस्वी को ग्राम- मड़वनियाँ, प्रखंड- रमना, वर्तमान में जिला- गढ़वा में हुआ था। इनकी शिक्षा जिला हाई स्कूल डाल्टनगंज से मैट्रिक एवं बैचलर ऑफ कॉमर्स बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हुआ था। इनकी पत्नी का नाम शकुंतला देवी एवं इनके दो बेटियां एवं एक पुत्र श्री दीपक किशोर सिंह है। दीपक किशोर सिंह भी सामाजिक कार्य में लगे रहते हैं। इनका भरा-पूरा परिवार अभी रांची में रहता है। महात्मा गांधी एवं जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित होकर भारत छोड़ो आंदोलन 1942 ईस्वी में अंग्रेज हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ उन्होंने कड़ा संघर्ष किया एवं इनके साथियों समेत 18 जून 1942 को गिरफ्तार कर डालटेनगंज जेल में भेज दिया गया। इनके उग्र विरोध एवं बढ़ते कदम को देखकर अंग्रेजों ने इन्हें हजारीबाग जेल में शिफ्ट कर दिया। दिनांक 4 मार्च 1943 को इनको पूरी सजा काटने के बाद रिहा किया गया। इन्हें 6 महीने का सश्रम कारावास एवं ₹25 जुर्माना लगाकर मुक्त किया गया। ये बनारस में भी इस आंदोलन के अग्रणी नेता रहे। आजादी के बाद ये नौकरी में आए, जहां से बिहार सरकार में ऊंचे पद पर रहें। बिहार सरकार में डिप्टी डायरेक्टर सांख्यिकी के पद से 1981 ईस्वी में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने अनेक सामाजिक कार्य किया। सरकार से इन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पेंशन भी प्राप्त हुआ, जो आज उनकी पत्नी कुंवर शकुंतला देवी को मिलते आ रहा है। इनकी मृत्यु 28 मई 1995 ईस्वी को पटना में हुआ तथा अंतिम संस्कार में राज्य के कई वरीय पदाधिकारी एवं राज्य के नेतागण शामिल हुए।

स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय मुजाहिद जामा खाँ की जीवनी व स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान
इनका इनका जन्म सन 1930 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर उलिमा गांव में हुआ था। इनके पिताजी का नाम स्वर्गीय करीम खाँ था। परंतु ये मूल रूप से ग्राम- परासपानी खुर्द, पंचायत- खुटिया, प्रखंड एवं थाना- धुरकी के निवासी थें। सन 1921 ईस्वी में उनकी नियुक्ति बिहार पुलिस में हुई थी, जिनका कॉन्स्टेबल संख्या- 395 था। 1942 ईस्वी में जमशेदपुर के बिष्टुपुर के डाकघर पर देशभक्तों की एक टोली के साथ इन्होंने अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ बगावत किया था, जिसमें स्वर्गीय मुजाहिद जामा खाँ चाईबासा कारागार गए थें। इन्हें सन 1947 ईस्वी में कारागार से आजादी के बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति माननीय स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद के सहानुभूति के कारण पुलिस कांस्टेबल के रूप में पुनः नियुक्त किया गया। स्वर्गीय मुजाहिद जामा खाँ सन 1949 ईस्वी में सर्विस ज्वाइन किए एवं उनकी दोबारा नियुक्ति थाना- भवनाथपुर, पलामू में हुई, जो वर्तमान समय में जिला- गढ़वा अंतर्गत आता है। इसके पश्चात नगर उंटारी थाना में भी इन्होंने ज्वाइन किया। स्वर्गीय मुजाहिद जामा खाँ धुरकी प्रखंड के खुटिया पंचायत अंतर्गत परासपानी खुर्द में निवास किये। स्वतंत्रता सेनानियों में ये प्रथम स्थान रखते थे, इसीलिए उन्हें पेंशन से नवाजा गया था, जिनका पेंशन संख्या- 1147 था। स्वर्गीय मुजाहिद जामा खाँ अस्वस्थ होने के कारण अपने छोटे पुत्र के पास 13 सितंबर सन 1996 ईस्वी को इलाज कराने जमशेदपुर गये जहां उनकी मृत्यु हो गई तथा जमशेदपुर के साक्ची कब्रिस्तान में सुपुर्द -ए- खाक किए गए।“`