संस्कृत ग्रंथों में विद्यमान हैं वैचारिक बहुलता के साक्ष्य: डॉ मिथिलेश

रामगढ़: शुक्रवार को रामगढ़ महाविद्यालय के संस्कृत विभाग एवं आई.क्यू.ए.सी. तथा संस्कृत भारती के संयुक्त प्रयासों से ‘भारतीय संस्कृति में वाद-विवाद संवाद की परंपरा एवं संस्कृत’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता महिला महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. शारदा प्रसाद ने की। विषय प्रवेश करते हुए कार्यक्रम संयोजिका डॉ. प्रीति कमल ने कहा कि भारतीय परंपरा में सदा से बौद्धिक समूह स्व स्तर से संवाद करते और प्रतिपक्ष को भी अपने साहित्य में स्थान देते रहे हैं। इस दृष्टि से वैचारिक असहमतियों को सहन करने की सुदीर्घ परंपरा के साक्षी संस्कृत ग्रंथों में स्थित आलोचनात्मक द्वंद्वात्मकता के उदाहरणों को स्मृति में लाए जाने की आवश्यकता है। मुख्य वक्ता के तौर पर उपस्थित रामगढ़ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मिथिलेश कुमार सिंह ने रंभा-शुक- संवाद का उल्लेख के द्वारा भारतीय चिंतन एवं आचरण परंपरा में विद्यमान सिद्धांत व व्यवहार के द्वंद की साहित्यिक उपस्थिति के विषय में बताया। ज्ञान प्राप्ति के चारों प्रकारों पर सम्यक प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत ग्रंथों में विद्यमान पूर्व पक्ष एवं उत्तर पक्ष के रूप में उपस्थित वैचारिक बहुलता के साक्ष्य को जाने बिना भारतीय समृद्ध परंपरा को समझना कठिन है। अध्यक्षीय अभिभाषण में डॉ. शारदा प्रसाद ने यक्षप्रश्न की लघुकथा के माध्यम से कहा कि संस्कृत ग्रंथों में स्थित वाद-संवाद पर आधारित चिरंतन धारा को आज के संदर्भ में पुनर्जीवित किए जाने की आवश्यकता है। सह-आयोजक डॉ. सुनील कुमार कश्यप ने संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए संस्कृत भारती के द्वारा किए जाने वाले प्रयासों से अवगत कराते हुए विविध क्षेत्रों में विद्यमान संस्कृत के महत्वपूर्ण योगदान को संस्कृत भाषा में बताया। मंच संचालन डा. प्रीति कमल ने एवं धन्यवाद ज्ञापन रामगढ़ कालेज की आइ.क्यू.ए.सी. समन्वयक डॉ. रत्ना पांडे ने किया। कार्यक्रम के सुधी श्रोता के रूप में दुर्गा बेदिया, गौतम महतो, संदीप महतो, कमलेश कुमार, शकुंतला देवी, नेहा, रोहित, अपर्णा, अमिता, बसंती, नकुल, राखी, रविता, राधिका, पंकज, सुरेश, गायत्री, लक्ष्मी आदि विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इसे सफल बनाने में अपना योगदान दिया।