राजवंश द्वारा स्थापित महागामा दुर्गा मंदिर में तांत्रिक विधि से होती है पूजा

मुकेश कुमार की रिपोर्ट
महागामा: करीब 600 वर्ष पूर्व राजवंश द्वारा स्थापित महागामा का मां दुर्गा मंदिर भक्तों के लिए आस्था एवं श्रद्धा का चर्चित आध्यात्मिक केंद्र है। महागामा के हटिया चौक स्थित दुर्गा मंदिर में तांत्रिक विधि से पूजा होती है। लोगों का मानना है कि इस मंदिर में सच्चे एवं स्वच्छ हृदय से पूजा करने पर भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, दुर्गा मंदिर खेतोरी वंश के राजा मोल ब्रह्म के वंशजों के द्वारा स्थापित की गई है। यह पुराने राजा परिवार की कुलदेवी का मंदिर है। आज से करीब छह सौ वर्ष पहले तांत्रिक पद्धति से स्थापित की गई थी। आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में माता की तांत्रिक पद्धति से पूजा-अर्चना होती है। नवरात्र के समय यहां काफी दूर दराज से लोग पूजा करने के लिए आते हैं।नवरात्र के प्रथम पूजा के पूर्व रात्रि में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय श्रद्धालु महागामा से कहलगांव गंगा स्नान के लिए जाते हैं। श्रद्धालुगण कहलगांव के गंगा घाट से गंगाजल भर कर करीब 45 किलोमीटर की दूरी पैदल या वाहन द्वारा लाते हैं। पूरे नवरात्र में इसी पवित्र गंगाजल से पूजा-पाठ का सारा काम होता है।
राजा मोल ब्रह्म के वंशज दयाशंकर ब्रह्म ने बताया कि यह परंपरा करीब छह सौ वर्ष से चली आ रही है। गंगा नदी में स्नान कर भक्तिभाव से पवित्र जल लाकर पूरे नवरात्र में विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्र के छठे दिन शाम महागामा दुर्गा मंदिर के करीब चार सौ मीटर दूरी पर स्थित बेलपत्र वृक्ष के जुड़वा बिल्ब (माता बेलभरण) की पूजा की जाती है। इसके बाद गाजे बाजे के साथ विधि-विधान पूर्वक पंडित एवं तत्कालीन राजा परिवार के सदस्यों के द्वारा माता बेलभरण को पूजन कर आमंत्रित किया जाता है। सप्तमी पूजा के तड़के सुबह माता बेलभरण का पूजन विधि विधान के साथ कर मंदिर परिसर लाया जाता है। बेल के वृक्ष से माता बेलभरण को लेकर राजा परिवार के लोग एवं पंडित गण खड़े रहते हैं। माता बेलभरण को प्रणाम कर हजारों की संख्या में भक्तजन रास्ते की साफ सफाई करते हुए माता के मंदिर तक पहुंचते हैं। इस दौरान दर्जनों श्रद्धालु माता को दंडवत पूजा भी करते हैं।
मार्ग की साफ सफाई के बाद स्थानीय महिला श्रद्धालुओं के द्वारा छर्रा दिया जाता है। इस दौरान महिलाएं हाथों मं कुल्हड़ लिए रहती हैं। कुल्हड़ में दूध, पुष्प भरा होता है। महिलाएं बेलभरण माता को चरण स्पर्श कर पूरे रास्ते में दूध पुष्प से रास्ते पांवड़ा बिछाते हुए मंदिर प्रांगण तक जाती हैं। राजा परिवार के लोगों एवं पंडितों के द्वारा मां बेलभरण को मंदिर प्रांगण में ले जाया जाता है। जहां नवपत्रिका द्वारा उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। सर्वप्रथम बेलभरण मां को मंदिर में प्रवेश कराया जाता है। बाद में माता की मूर्ति को गर्भ गृह में स्थापित किया जाता है। सप्तमी की रात्रि माता को 56 प्रकार के भोग लगते हैं। अष्टमी की रात्रि 12 बजे के बाद भगवती का तांत्रिक पद्धति से पूजन होता है। पूरे नवरात्र भर मंदिर में अखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है। अष्टमी की रात मंत्र-तंत्र सिद्धि करने वाले साधकों का जमावड़ा लगता है। वे सिद्धि प्राप्ति का प्रयास करते हैं। लोगों का कहना है कि दिन प्रतिदिन यहां पूजा करने वालो की भीड़ बढ़ती जा रही है।