कार्यशाला में नवजात शिशु के देखभाल की दी गई जानकारी

गोड्डा: शहरी स्वास्थ्य मिशन, गोड्डा के तत्वावधान में शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रौतारा में रविवार को नवजात शिशु सप्ताह कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला की अध्यक्षता जिला कार्यक्रम समन्वयक मनोज कुमार महतो कर रहे थे।
उन्होंने बताया कि नवजात शिशु देखभाल सप्ताह देश में प्रतिवर्ष 15 से 21 नवंबर तक मनाया जाता है। इस सप्ताह को मानने का उद्देश्य बच्चे की उत्तरजीविता और विकास के लिए नवजात शिशु की देखभाल के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।
बच्चे की उत्तरजीविता के लिए नवजात काल की अवधि (जीवन के पहले 28 दिन) महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि इस अवधि में बाल्यवस्था के दौरान किसी अन्य अवधि की तुलना में प्रतिदिन मृत्यु का जोखिम अधिक होता है। आजीवन स्वास्थ्य और विकास के लिए जीवन का पहला महीना आधारभूत अवधि है। स्वस्थ शिशु स्वस्थ वयस्कों में विकसित होते है, जो कि अपने समुदायों और समाजों की उन्नति एवं विकास में योगदान करते हैं।
मौके पर गैर सरकारी संस्था एकजुट के सरफराज ने बताया कि नवजात एवं मातृ उत्तरजीविता के लिए पीड़ा, जन्म और जन्म के समय की अवधि सबसे महत्वपूर्ण है।75 प्रतिशत नवजात शिशुओं की मृत्यु को जन्म और जीवन के पहले सप्ताह के दौरान उपलब्ध प्रभावी स्वास्थ्य उपाय एवं जानकारी से रोका जा सकता है।
एसटीटी विवेकानन्द प्रसाद ने बताया कि नवजात की मृत्यु के मुख्य कारण अपरिपक्वता, जन्म के दौरान जटिलताएं, गंभीर संक्रमण हैं।

नवजात शिशु देखभाल

सभी नवजात शिशुओं में बीमारी के जोखिम को कम और उनकी वृद्धि बढ़ाने और विकास के लिए आवश्यक नवजात शिशु देखभाल की आवश्यकता होती है। जन्म के समय बच्चे की मूलभूत जरूरत वात्सल्य/मां की गरमाहट, सामान्य श्वास, मां का दूध और संक्रमण की रोकथाम है। ये मूलभूत जरूरत दर्शाती है कि बच्चे की उत्तरजीविता पूरी तरह से उसकी मां और अन्य देखभाल करने वालों पर निर्भर है। इसलिए जन्म के तुरंत बाद सभी शिशुओं को उचित देखभाल प्रदान करना महत्वपूर्ण है।
यह देखभाल कई नवजात आपातकालीन स्थिति को रोकेगी।

नवजात शिशुओं की देखभाल

तुरंत और अच्छी तरह से पोंछना। मां से नवजात शिशु का त्वचा से त्वचा संपर्क होना। जन्म के बाद गर्भनाल दबाना और काटना। स्तनपान की तुरंत शुरुआत एवं केवल स्तनपान कराना। शहरी स्वास्थ्य प्रबंधक जयशंकर ने बताया कि जीवन के पहले घंटे के बाद नवजात शिशुओं को आंखों की देखभाल, विटामिन और अनुशंसित टीकाकरण (ओपीवी जन्म टीका और हेपेटाइटिस बी टीका, बीसीजी) मिलना चाहिए। उसका जन्म के समय भार, गर्भकालीन आयु, जन्मजात दोष और नवजात बीमारी के संकेत का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। बीमार नवजात शिशुओं को विशेष देखभाल प्रदान की जानी चाहिए, जो कि अपरिपक्व या जन्म के समय कम वजन तथा एचआईवी से संक्रमित या संपर्क या जन्मजात सिफलिस से पीड़ित है। इस जागरूकता कार्यशाला में बीटीटी प्रह्लाद कुमार, बेबी कुमारी, एएनएम अराधना कुमारी, सहिया किरण, प्रेमलता झा, प्रेमलता कुमारी तरन्नुम खातून, रानी देवी आदि ने भाग लिया।