झारखंड जनाधिकार महासभा ने खूंटी के टकरा में सम्मेलन का आयोजन किया

खूंटी: झारखंड जनाधिकार महासभा का पहला राज्य सम्मेलन जयपाल सिंह मुंडा, जिन्होंने कई वर्षों तक झारखंड आंदोलन को प्रेरित और नेतृत्व किया, के पैतृक गांव टकरा (खूंटी जिला) में हो रहा हैं। लोगों के नागरिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए विभिन्न संघर्षों में शामिल लगभग 100 प्रतिभागियों ने झारखंड के विभिन्न हिस्सों से तीन दिन बिताने और अपने अनुभव और विचार साझा करने के लिए एकत्र हुए। टकरा की हरियाली और प्रतीकात्मक महत्व इस आयोजन के लिए एक आदर्श स्थल हैं।
2018 में स्थापित, झारखंड जनाधिकार महासभा कई संगठनों और कार्यकर्ताओं का मंच है। सम्मेलन का प्रसंग “स्व-शासन, लोकतंत्र और वर्तमान चुनौतियां” है।
सम्मेलन की शुरुआत आसानी से नहीं हुईl 1 अक्टूबर को शुरू होने के कुछ ही घंटे पहले, आयोजकों को एसडीओ का एक पत्र मिला जिसमें उन्होंने कोविड -19 का हवाला देते हुए कार्यक्रम की अनुमति देने से इनकार कर दिया। यह आश्चर्यजनक था क्योंकि पूरे आयोजन की योजना स्थानीय निवासियों के पूर्ण समर्थन से कोविड -19 दिशानिर्देशों के भीतर बनाई गई थी। ऐसे खबर है  कि कुछ जन विरोधी सोच वाले लोग इस आयोजन को विफल करने की कोशिश कर रहे थे।  उपायुक्त ने आयोजकों की बात सुनने के बाद एसडीओ के निर्णय को ख़ारिज करते हुए कार्यक्रम का स्वागत किया l इस  घटना से महासभा के सम्मेलन के प्रसंग – लोकतान्त्रिक अधिकारों पर बढ़ते हमलों – की आवश्यकता स्पष्ट हो गयी.
सम्मलेन के पहले सत्र में प्रतिभागियों ने मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के जीवन और विचारों को याद किया। इस विषय पर जाने माने लेखक अश्विनी पंकज ने जयपाल सिंह मुंडा के आवश्यक विचारों का विवरण दिया: उदाहरण के लिए, आदिवासी कैसे “पृथ्वी पर सबसे लोकतांत्रिक लोग हैं”, आदिवासी मूल्यों की महत्व और झारखंड के लिए जयपाल सिंह की दृष्टि l
अगले सत्र में, तीन वरिष्ठ वक्ताओं ने आज भारत में लोकतंत्र की स्थिति और आगे की राह पर चर्चा की। प्रसिद्ध आदिवासी कार्यकर्ता और लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग ने तर्क दिया कि भारत में वास्तविक लोकतंत्र नहीं हैं। लोकतंत्र एक मिथक है, उन्होंने कहा, जब आदिवासियों को अभी भी हीन नागरिक के रूप में माना जाता है और उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जाता है। उन्होंने बताया कि संविधान भी ऐसे एक संविधान सभा द्वारा बनाया गया था, जहां 70% से अधिक सदस्य ऊंची जातियों के थे, इसलिए हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि यह वंचित समूहों के हितों की रक्षा करेगा। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की महासचिव कविता श्रीवास्तव ने कुछ हफ्ते पहले फादर स्टेन स्वामी की संस्थागत हत्या के प्रतीक लोकतांत्रिक अधिकारों के सिकुड़ने के बारे में बात की। उन्होंने प्रतिभागियों को पेगासस द्वारा सरकार की बढ़ती निगरानी की भी चेतावनी दी। दयामणि बारला, जिन्होंने झारखंड में विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों के कॉर्पोरेट हड़प के खिलाफ कई अभियानों में  सक्रिय भूमिका निभाई, ने इन जनविरोधी ताकतों के खिलाफ राजनीतिक रूप से एकजुट होने की आवश्यकता के बारे में बताया।
अगले सत्र की नेतृत्व झारखंड जनाधिकार महासभा की युवा शाखा ने किया। आशुतोष तिर्की, दीपक रंजीत, गुंजल इकिर मुंडा, प्रियंका सोरेन और अन्य ने झारखंड के युवाओं की बेरोजगारी, पहचान, यौन हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य जैसी विभिन्न चिंताओं के बारे में बात की। प्रस्तुतियों के बाद एक जीवंत चर्चा हुई क्योंकि प्रतिभागियों ने लोकतांत्रिक संस्थानों की विश्वसनीयता, झारखंड के आर्थिक भविष्य और अन्य मामलों के बारे में कठिन सवाल उठाए।
2 अक्टूबर को झारखंड में श्रमिकों के अधिकारों, किसानों के आंदोलन, स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन पर जीवंत सत्रों के साथ जारी रहा। कुमार चंद्र मार्डी ने बताया कि कैसे झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों, जैसे कि इसके जल संसाधनों पर कॉरपोरेट घरानों द्वारा छापा मारा जा रहा हैं, जबकि स्थानीय निवासियों को इन साधनों से वंचित् छोड़ दिया गया हैं। वर्किंग पीपुल्स चार्टर के समन्वयक चंदन कुमार ने झारखंड में प्रवासी श्रमिकों के संघ के गठन के लिए तर्क दिया। झारखंड में नरेगा वॉच के समन्वयक जेम्स हेरेन्ज ने बताया कि कैसे नरेगा श्रमिकों के लिए रांची या जमशेदपुर के श्रमिक अड्डा में खुद को दैनिक आधार पर बेचने से बचने का एक अवसर हैं। लातेहार में भीम आर्मी के रमेश जाटव ने अपने संगठनों के काम की बात की और झारखंड के युवाओं से इसमें शामिल होने की अपील की. घरेलू कामगार संघ की पूनम होरो ने घरेलू कामगारों की दुर्दशा के बारे में बात की और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक विशेष कानून बनाने की अपील की।
इसके बाद प्राकृतिक संसाधनों पर हमले और जनविरोधी खनन पर एक सत्र का आयोजन किया गया। पूर्व विधायक देवेंद्र नाथ चंपिया ने पांचवीं अनुसूची और पेसा को अक्षरश: लागू करने की आवश्यकता पर बात की। चिंतामणि साहू ने बताया कि कैसे गोड्डा में अडानी पावर प्लांट कई कानूनों का उल्लंघन करता है और स्थानीय लोगों के लिए फायदेमंद नहीं है। जॉर्ज मोनिपल्ली और रोज़ ज़ाक्सा ने वन अधिकार अधिनियम के खराब कार्यान्वयन के बारे में बात की। दिन के अंतिम सत्र में केंद्र सरकार द्वारा बढ़ते दमन और राज्य में जारी मानवाधिकारों के उल्लंघन पर गहन चर्चा हुई। लातेहार की जीरामनी देवी ने साझा किया कि कैसे उनके पति ब्रम्हदेव सिंह, जब छोटे जानवरों के पारंपरिक शिकार के लिए निकले थे, रब सुरक्षा बलों द्वारा खुलेआम गोली से मारे गए थे। हीरालाल टुडू ने बताया कि कैसे उन्हें यूएपीए के तहत नक्सलवाद के झूठे आरोपों में कैद किया गया था।
सम्मेलन ने बहुत ऊर्जा पैदा की और उम्मीद है कि यह झारखंड में जन संगठनों को एक नया जीवन देगा, जब कई लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जन आंदोलन जल्द ही फिर से संभव होगा।