मां दक्षिणेश्वर की अद्भुत, अविश्वसनीय, और चमत्कारी है दुगदा की काली पूजा

बोकारो से जय सिन्हा
बोकारो:  बोकारो के चंद्रपुरा प्रखंड मुख्यालय से पांच किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित दुगदा पूर्वी पंचायत के फुलझरिया बस्ती में विगत 205 सालों से मां काली की पूजा बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पूजा को लेकर फुलझरिया ही नहीं बल्कि आसपास के सैकड़ों गांव के लोग हर साल पूजा अर्चना के लिए आते हैं। मां काली पूजनोत्सव के समय आते ही गांव की रौनक बढ़ जाती है। पूजनोत्सव में दुगदा ही नहीं बल्कि बोकारो ,धनबाद, बेरमो से श्रद्धालु गण भाग लेकर मां काली की पूजा अर्चना करते हैं। तीन दिनों तक चलने वाले मां काली पूजनोत्सव में भक्तजनों का उत्साह देखते बनता है। काली पूजा के दिन हजारों की संख्या में यहां श्रद्धालुओं का आगमन होता है जो यहां पूरे भक्ति भाव से मां काली की पूजा करते हैं ! यहां
बारी लाने का विशेष महत्व है! पूजा प्रारंभ होने के पूर्व बड़का बांध से बारी लाने की प्रथा है! पुजारी द्वारा एक मिट्टी के कलश में पानी लाया जाता है, लेकिन महज आधा किलोमीटर दूर से पुजारी को आने में तीन से 4 घंटे का समय लग जाता है। मान्यता है कि इस दौरान पुजारी पर मां सवार हो जाती है और वह मंदिर आना नहीं चाहती है। मां को मंदिर जाने के दौरान बाजे, गाजे,ढोल, नगाड़े,मशाल आदि का प्रयोग किया जाता है! उस वक्त पुजारी भी नृत्य करते हैं, और पुरी रास्ते कलर से पानी गिरता रहता है! लेकिन इसके बावजूद भी कलश से पानी कम नहीं होते! करीब 200 वर्ष पूर्व हजारीबाग नरेश कामाख्या नारायण सिंह, मां काली दक्षिणेश्वरी को कोलकाता से हजारीबाग,पदमा ले जा रहे थे, मगर बोकारो जिले की सीमावर्ती क्षेत्र दुगदा में प्रवेश करने के बाद वे आगे नहीं बढ़ पाए। तब मजबूरन उन्होंने उसी स्थल पर मां काली की प्रतिरुप को स्थापित कर दिया। पदमा नरेश एवं उनके परिवार वाले हजारीबाग से साल में एक बार मां काली दक्षिणेश्वरी की पूजा करने आया करते हैं। पुजारी ने बताया कि पदमा नरेश ने चक्रवर्ती परिवार को पूजन का दायित्व सौंपा। तब से अब तक चक्रवर्ती परिवार मां काली की पूजा करती आ रहा है! पूरे भारतवर्ष में एकलौता मंदिर है जहां वारी लाने की प्रथा निभाई जाती है जहां सैकड़ों पाठों की बलि दी जाती है जिससे बली स्थल खून से रंग जाता है।