खूंटी जिले में आंदोलन की तर्ज पर बन रहे माइक्रो बोरीबांध

खूंटी : खूंटी जिले के सुदूरवर्ती और नक्सल प्रभावित इलाकों में माइक्रो बोरीबांध अब आंदोलन का रूप लेने लगा है। जनजातीय इलाकों में मदईत परंपरा से बन रहे बोरीबांध में जिले के अधिकारी भी समानता की भागीदारी निभाते हुए हिस्सा लेने लगे हैं। जिले के उपविकास आयुक्त और मुरहू बीडीओ जब नक्सल प्रभावित सीमावर्ती गांव संकरे उबड़ खाबड़ रास्ते से डाहंगा पहुंचे तो माइक्रो बोरीबांध बना रहे ग्रामीणों का उत्साह देखते बन रहा था।

उपविकास आयुक्त अरुण कुमार सिंह और मुरहु बीडीओ ग्रामीणों के साथ बालू भरे प्लास्टिक की बोरियों को उठाकर बांध की दीवार बनाने में बराबरी की भूमिका निभाई। देखते ही देखते नक्सल प्रभावित सीमावर्ती गांव में पांच माइक्रो बोरीबांध बन गए। हजारों गैलन पानी का संचयन ग्रामीणों ने सिर्फ मदईत परंपरा से कर डाला।

खूंटी जिला प्रशासन, सेवा वेलफेयर सोसाईटी और जिले की ग्रामसभाओं द्वारा संयुक्त रूप से जनशक्ति से जलशक्ति आंदोलन चलाया जा रहा है। इस आंदोलन से ग्रामीणों के साथ जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारी, कर्मी और स्थानीय जनप्रतिनिधि भी जुड़ रहे हैं। जिले के डीडीसी अरूण कुमार सिंह, मुरहू के बीडीओ प्रदीप भगत, कनीय अभियंता आलोक सिंह, पंचायत सचिव उमेश्वर काशी समेत रोजगार सेवक, पंचायत समिति सदस्य क्लेमेंट होरो, सेवा वेलफेयर सोसाईटी के अध्यक्ष समेत गांव के पुरूष, महिलाऐं, युवक-युवतियों ने मदईत (श्रमदान) किया। छोटे बच्चों ने भी अपनी नन्हीं हाथों से बांध बनाने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।

बोरीबांध के बनते ही लोगों ने मछलियां मारनी शुरू की और गांव के लोगों ने लगभग दस किग्रा मछलियां भी पकड़ी। ग्रामीणों ने परंपरा के अनुसार मदईत कर बांध बनाने के बाद गांव में सामुहिक रूप से भोज का आयोजन भी किया। जल संरक्षण के साथ मिलजुल काम करने और खाना खाने का भरपूर आनंद गांव के लोगों ने उठाया। इस कार्य से गांव का माहौल खुशनुमा हो गया।

डीडीसी अरूण कुमार सिंह ने कहा कि जनशक्ति से जलशक्ति आंदोलन सराहनीय है। खूंटी के दुर्गम इलाके में पानी दुर्लभ होता जा रहा है। भूगर्भिय जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। ऐसे में पानी को बचाने के लिए सेवा वेलफेयर सोसाईटी और ग्रामीणों के द्वारा जिला प्रशासन के सहयोग से जल के लिए चलाया जा रहा यह आंदोलन काफी सराहनीय है। इससे क्षेत्र की जनता को काफी लाभ होगा।

बोरीबांध में श्रमदान करने पहुंचे डीडीसी ने जेई को सलाह दी कि वे किताबी ज्ञान के अलावा यहां के ग्रामीणों से भी सीखें। डाहंगा में पूर्व से आदिवासियों द्वारा पत्थरों से की गई मेढ़बंदी, पत्थर और बोरियों से हुए बांध निर्माण से सीख लेने की बात उन्होंने जेई से कही।

डाहंगा के ग्रामीण एतवा कंडुलना ने कहा कि बोरीबांध बनने के कई फायदे गांव को मिलेंगे। लोग जहां गेंहूं और सब्जी की खेती कर सकेंगे। वहीं नहाने-धोने, मवेशियों को पानी पिलाने में सुविधा होगा। गर्मी के दिनों में अब पानी का संकट झेलना नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि बीडीओ साहब ने यहां लूज बोल्डर स्ट्रक्चर बनवाने का आश्वासन दिया है। ऐसा हुआ तो और भी फायदे मिलेंगे।

डाहंगा गांव में बने पांच बोरीबांध श्रमदान में सुबासी तोपनो, सबीता सोय, जोनेत हस्सा पुर्ती, मरियम डंगवार, राहिल डंगवार, अस्मिता डंगवार, जोहन कंडुलना, ख्रिस्टोफर कंडुलना, अनिल कंडुलना, सुशील कंडुलना, रंजीत कंडुलना, कालेब कंडुलना, अरविंद कंडुलना, प्रभूसहाय कंडुलना, भुषण सुरीन, मंगरा, सींगा डंगवार, जोहन डंगवार, मंदरू डंगवार, एतवा पुर्ती, सिमोन भेंगरा, जादो पुर्ती, जोवाकिम पुर्ती, सिंगा बोदरा, बुटका बोदरा,मिखाईल हस्सा पुर्ती समेत छोटा और बड़ा डाहंगा के ग्रामीण शामिल थे। सभी ग्रामीणों ने मदईत परंपरा से मात्र एक दिन में पांच माइक्रो बोरीबांध का निर्माण कर डाला।