टोक्यो ओलंपिक में खूंटी की बेटी निक्की प्रधान अपना दम दिखाने पहुंची

खूंटी : टोक्यो ओलंपिक में झारखंड की तीन बेटियां अपना दम दिखाने पहुंच चुकी हैं। किसी के निशाने पर गोल्ड है तो कोई गोल्ड के लिए गोल दागने को तैयार है। टोक्यो ओलंपिक 2020 में झारखंड की तीन बेटियां गोल्ड के लिए जोर लगाने को तैयार हैं। विश्व की नंबर-1 तीरंदाज दीपिका कुमारी गोल्ड के लिए निशाना लगाएंगी तो निक्की प्रधान और सलीमा टेटे देश को गोल्ड दिलाने के लिए हॉकी में गोल दागने को तैयार हैं।

टोक्यो ओलम्पिक गेम के लिए पहुंची निक्की प्रधान छोटे से जिला खूंटी के हेसेल गांव की रहने वाली है। पिता सोमा प्रधान खेती किसानी का काम करते हैं और माता जितेन देवी घर गृहस्थी का काम संभालती हैं। बड़ी बहन शशि प्रधान हॉकी की बदौलत आज रेलवे में पदस्थापित हैं वहीं बहन कांति प्रधान ने भी हॉकी को ही अपना कैरियर बना लिया। दो बहनों का हॉकी में कैरियर बन जाने से निक्की प्रधान ने भी हॉकी को ही अपना वर्तमान और भविष्य बना लिया।

निक्की प्रधान के पिता बताते हैं कि छोटी सी उम्र में ही गांव के बच्चे हॉकी से परिचित थे। बांस की बनी कच्ची हॉकी स्टिक और बांस के जड़ से बने गेंद गांव के बच्चों को हॉकी का ककहरा सीखने के लिए काफी था। निक्की की पढ़ाई लिखाई पेलौल स्थित सरकारी विद्यालय में हुई। 5 भी बहनों में दूसरे स्थान पर रही निक्की को हॉकी खेलने का परिवार8के माहौल भी मिला। बड़ी बहन और छोटी बहनों के साथ निक्की भी हॉकी में अपना हुनर दिखाने लगी। पेलौल के सहायक शिक्षक दशरथ महतो उन दिनों हॉकी के प्रति रुचि रखने वाली छात्राओं को हर दिन सुबह मैदान में हॉकी की बारीकियां सिखाते थे। उसी वक्त निक्की प्रधान की रनिंग क्षमता से हॉकी कोच दशरथ महतो प्रभावित हुए और निक्की को हॉकी के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश की। शुरुवात में निक्की मैदान से भाग जाती थी लेकिन दशरथ महतो की हॉकी की पाठशाला में सभी छात्राओं को खेलने और जीतने का जुनून तथा जज्बा पैदा किया। छोटे – छोटे स्थानीय खस्सी टूर्नामेंट, मुर्गा टूर्नामेंट में दशरथ महतो छात्राओं को टीम बनाकर खेलने के लिए ले जाते थे।छोटे स्तर के मुर्गा-खस्सी टूर्नामेंट में जीतने की खुशी टीम में शामिल प्रत्येक खिलाड़ी को होती थी। धीरे धीरे जीत का जुनून खेल के क्षेत्र में कैरियर बनाने की ओर बढ़ता गया। और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संसाधनों की व्यवस्था कर एक एक खिलाड़ी को गोलपोस्ट पर निशाना साधने की कला सिखायी। कोच दशरथ महतो ने खूंटी की बालिकाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी में पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

समय के साथ निक्की प्रधान राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह बनाने में सफल रही 2011 से लगातार भारतीय महिला हॉकी टीम से खेलती रही हैं। 2012 के एशियाड में भी निक्की प्रधान को खेलने का मौका मिला और भारतीय टीम चैंपियन बनी। एशियाड में चैंपियन बनने के बाद हॉकी ओलंपिक में भी खेलने का सपना 2016 में झारखण्ड की पहली महिला के रूप में पूरा हुआ और टोक्यो ओलंपिक में दूसरी बार पुनः खूंटी की बेटी ने बेहतर खेल प्रतिभा के बल पर राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनी। निक्की समेत झारखण्ड की तीन बेटियां टोक्यो में आयोजित ओलंपिक में शामिल होने के लिए पहुंच चुकी हैं। झारखण्ड समेत पूरे देश के खेल प्रेमियों की उम्मीदें बेटियों के गोल्ड पर गोल दागने की हैं।