लिंग भेद के नाम पर अंतर न हो 

विचार

देश की आजादी सही मायने में तभी चरितार्थ हो सकती है जिस देश मे लिंग भेद के नाम पर वर्गीकरण न हो , महिलाओं , बच्चों के अधिकारों की रक्षा हों व सम्मान मिले , शिक्षा , आजादी मिले । जीवन की दिशा तय करने का अधिकार मिले , अपने रुचि के मुताबिक अपने कैरियर को संवारने का मौका मिले , आजाद भारत में किसी भी महिला / बच्चों को अपना कैरियर चुनने का अधिकार भारतीय संविधान के मूल में वर्णित है जिसपर सारगर्भित अमल की जा सके ।

लेखक: डॉ प्रभाकर कुमार

जीवन में महिलाएं / बच्चे इतना सछम बनें की अपनी जिंदगी की जरूरतों को खुद पूरा कर सकें , परजीवी प्रवृति त्यागकर आत्मनिर्भर , स्वाबलंबन कि ओर उन्मुख हों । माता पिता , परिवार पर इसके लिये महिलाएं / बच्चे आश्रित न रहें बल्कि अपना खुद का अस्तित्व बनायें । किसी के ऊपर आश्रित रहने से जरूरतें पूरा होती हैं , सपने नहीं ।

जीवन का आत्म स्वाभिमान सपनों को पंख दिये जाने में निहित है । खुद के सपनों को साकार बनाने के लिये पतंग की डोर अपने हाथों में रखनी जरूरी है । 21 वी शदी में महिलाओं , बच्चों को पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलकर खुद आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होने पर बल दिये जाने की जरूरत है , ताकि भारत उन्नति के बहुआयामी आयाम को छू पायें । जिस देश की महिलाएं , बहनें , पत्नियाँ , माँ , बच्चे ताकतवर होंगे , वह देश समृद्धता की ओर उन्मुख होगी , अतुल्यता की ओर बढ़ेगी ।

देश के संविधान में लिंग भेद के नाम पर असमानता को दूर किये जाने पर बल , भातृत्व भावना को प्रबल किये जाने पर जोर , विश्व बंधुत्व की भावना पर बल आदि को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है । किसी देश की संविधान के परस्पर वहाँ के नागरिकजनों को मार्गदर्शन प्राप्त होते हैं ।

लेखक: डॉ प्रभाकर कुमार