मनोदैहिक विकृति के कारण असाध्य रोगों की बढ़ती प्रवृति

स्तंभ

लेखक: डॉ प्रभाकर कुमार

आज के भाग दौड़ के जीवन में यथासंभव तनाव , विभिन्न अंतर्द्वंद्व , नकारात्मक स्थिति , संवेगात्मक परिस्थितियों , भावनात्मक संवेगों से दूर रहने की कोशिश करनी चाहिये , इसकी जगह खुश रहना , विषम परिस्थितियों में तालमेल एवं सामंजस्य बिठाने की प्रवृति को विकसित करना , सकारात्मक चिंतन , आध्यात्मिक चिंतन , प्रसन्नता , कोई भी तनाव की परिस्थिति मे हर्ष विनोद कर या अपने मित्र / हितैषी को बोल कर मन हल्का , प्रफुल्लित करने की प्रथम आवश्यकता है अन्यथा तनाव , विपरीत परिस्थितियां , भावनात्मक आधात , निराशा भाव , कुंठा , नैराश्य भाव आदि व्यक्ति के शरीर के हार्मोन्स विशेषकर अंतःस्रावी ग्रंथियों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल रहे हैं और व्यक्ति अंततः मनोदैहिक विकृति का शिकार हो रहा है फलतः व्यक्तियों में अनेक तरह के शारीरिक रोगों , मानसिक रोगों , मनोशारीरिक रोगों / व्याधियों के रूप में रोग रूपांतरित – कैंसर , मधुमेह , हार्मोन्स असंतुलन , ह्रदयाघात , निम्न रक्त दबाब हाइपरटेंशन , मानसिक रोगों में वृद्धि , अनेक तरह की समाप्त न होने वाले रोगों में अप्रत्याशित वृद्धि होती है ।

इसलिए दुख , भावनात्मक आधातो , विषम परिस्थितियों , कुंठा , नैराश्य भावों आदि का निराकरण प्राथमिक स्तर पर कर लेना दूरगामी रोगों से बचने का सरल सूत्र है । वर्तमान समय में मनोदैहिक / मनोशारीरिक रोगों में लगातार इजाफा दिख रहा है । समाज अवश्य समृद्ध हो रही है पर इंसान अकेला , एकाकीपन , निराशा , छुब्ध , आध्यत्मिक रूझान कम , संवेगात्मक नियंत्रण में कमी , भावनात्मक रूप से कमजोर , अंदर ही अंदर घुटन , मनोभावों मे उतार चढ़ाव विभिन्न परिस्थितियों के कारण , विभिन्न यौन विकृतियों एवं अभिप्रेरण के स्तरों की अपर्याप्तता आदि की प्रधानता देखी जा रही है फलतः समाज में मनोदैहिक विकृति की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती दिख रही है ।

व्यक्ति को ऐसे आवेशों से बचते हुए हर्ष , विनोद , हास्य भाव , सामंजस्य एवं समयोजशीलता व्यवहार आदि को जीवन में प्रधानता दिए जाने की जरूरत है ताकि वातावरण के साथ सामंजस्य एवं समायोजनशीलता में वृद्धि की जा सके । 21 वी शदी मे मनोशारीरिक कारणों से रोगों की संख्या मे अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिल रही है जो अंततः जानलेवा सिद्ध हो रही है । इनके अतिरिक्त खान पान की अशुद्धता , दैनिक दिनचर्या की अनियिमित्ता , पौष्टिक खाद्य पदार्थों की कमी व्यक्ति को दिन प्रतिदिन रुग्णता की ओर अग्रसर कर रही है , साथ ही साथ पर्यावरण असंतुलन के कारण भी मनोशारीरिक रोगियों की संख्या में इजाफा देखने को मिल रही है । मानसिक , शारीरिक एवं शुद्ध पर्यावरण के अभाव के रूप से रुग्णता व्यक्ति को अंततः मनोदैहिक विकृतियों मे शामिल करते हैं जिनसे ऐसे असाध्य बीमारियों को जगह बनाने मे मदद मिलती है । देश मे वर्तमान समय मे मनोदैहिक रोगियों की संख्या मे लगातार इजाफा जारी है जिसका प्रभाव मनोवैज्ञानिक रूप से पड़ता दिख रहा है ।

डॉ प्रभाकर कुमार