पुण्यतिथि पर विशेष :नोबेल पुरस्कार प्राप्त रविंद्र नाथ टैगोर को पूर्व विधायक ने किया याद

टैगोर की विचारधारा ही अब तक की शिक्षा नीति का मूल आधार है : पूर्व विधायक मनोज यादव
बरही से बिपिन बिहारी पाण्डेय
बरही (हजारीबाग) : राष्ट्रगान के रचयिता, महान साहित्यकार, शिक्षाविद, नोबेल पुरस्कार प्राप्त रविंद्र नाथ टैगोर को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए बरही के पूर्व विधायक मनोज कुमार यादव ने याद किया। वहीं उनके संस्मरण में एक बयान जारी करते हुए कहा कि आज नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सर्वत्र चर्चा है, कुछ इनके समर्थन में तो कुछ आलोचना में अपने अपने शब्द बयां कर रहे हैंl राष्ट्रीय शिक्षा नीति पहली बार 1986 में बनी थी,वर्ष 1992 में कुछ सुधारों के साथ उसे पुनः लागू किया गया। पुनः 2020 में बहुत विचार विमर्श और मंथन के पश्चात विशेष शिक्षा नीति को लाया गया है। लेकिन मेरा मानना है कि रविंद्र नाथ टैगोर ने शिक्षा के उन्नयन तथा व्यक्तित्व के विकास, अच्छे इंसान का निर्माण तथा रोजगार मूलक शिक्षा की विचारधारा को लेकर तब के शांति निकेतन और अब के विश्व भारती की स्थापना की थी, अब तक जो शिक्षा नीति नीति आई है वह टैगोर के विचारों को केंद्र बिंदु मानकर उसी विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती है या यूं कह सकते हैं कि टैगोर की विचारधारा ही अब तक की शिक्षा नीति का मूल आधार है l मनोज कुमार यादव ने कहा कि आज के विश्व भारती तब के शांति निकेतन की स्थापना के पीछे टैगोर का एक मकसद था, कि किसानों, काश्तकारों, कमजोर वर्ग के लोगों तथा महिलाओं को जीवन में फैले अशिक्षा के अंधकार को इस संस्थान के माध्यम से दूर करें l गांव के जीवन को उन्होंने करीब से देखा था तब उन्होंने यह महसूस किया कि देश के विकास के लिए पहले इन गरीब किसानों का विकास बहुत जरूरी है। 1907 मैं शांति निकेतन की स्थापना हुई तो टैगोर के मन में यह सजग इच्छा थी कि यहां के माहौल ऐसा हो जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी के बीच कोई दीवार ना हो। उम्र और पदवी को भूलकर सब मिलकर काम करें। जँहा शिक्षा का मतलब किताबों में सीमित ना कहीं से भी ना हो। शांति निकेतन के माध्यम से इसे अमलीजामा पहनाया। यहां शांतिनिकेतन 1921 से विश्व भारती बन गया। ऐसे संस्थान की परिकल्पना जो बच्चों को शिक्षा के नाम पर पिंजरे में बंद किए जाने की परंपरा के खिलाफ थे। चित्रकारी, व्यायाम, विज्ञान से लेकर कविता संगीत बच्चों के व्यक्तित्व के अंग आ रहे। रविंद्र नाथ टैगोर का प्रकृति से निकटता तथा लगाव इनके कविताओं का प्रेरणास्रोत था। जिस कारण महात्मा गांधी ने इन्हें ‘गुरुदेव’ की उपाधि दी। नाइटहुड की उपाधि भी मिला। नोबेल पुरस्कार भी मिला।