सफलता की कहानी:  गुमला के मशरूम को तमिलनाडु में मिला बाजार

बसंत कुमार गुप्ता

गुमला: ग्रामीण इलाकों की अधिकतम महिलाएं आज रोजगार के वैकल्पिक माध्यम की ओर अग्रसर हो रही हैं। इन्हीं वैकल्पिक माध्यमों में से एक है मशरूम की खेती। जिसके तहत कम लागत पर परिवार के लिए पौष्टिक आहार मिलने के साथ-साथ यह रोजगार का बेहतर साधन भी सिद्ध हो रहा है। गुमला के फसिया पोढ़ाटोली के मशरूम की मांग तमिलनाडु में हो रही है। यहां के कच्चे एवं सुखाए हुए मशरूमों की तमिलनाडु के बाजार में खपत हो रही है। इस खपत को पूरा करने के लिए पोढ़ाटोली निवासी चेताली सेनगुप्ता ने अपने घर में ही मशरूम उत्पादन के लिए दो सौ से अधिक फ्रेम का निर्माण किया और इसी फ्रेम की मदद से मशरूम का उत्पादन कर रही हैं। कच्चा मशरूम तीन सौ रुपये व सूखा हुआ मशरूम आठ सौ रुपये प्रति किलो बाजार में बेचा जा रहा है। चेताली गाँव की दूसरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उन्हें मशरूम का बीज भी उपलब्ध करा रही हैं। मशरूम की बढ़ रही मांग को देखते हुए चेताली ने मयुरी ट्रस्ट बनाया है, जिसकी वह खुद सचिव भी हैं।

एक बीज से तीन बार फसल होती है तैयार

एक बार जिस पालीबैग में मशरूम के बीज डाले जाते हैं, उस पालीबैग में तीन लेयर में बीज डाला जाता है। 32 दिनों में यह मशरूम तैयार हो जाता है। एक बार मशरूम को अगर तोड़ लिया जाए तो उस स्थान पर फिर से दूसरी व तीसरी बार भी मशरूम का उत्पादन होता है। एक बीज से तीन बार मशरूम की फसल तैयार होती है। 10 हजार रुपये के बीज से एक क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता है।

कच्चा व सूखे माल की भी है मांग, महिलाएं मशरूम की खेती कर बन रही हैं आत्मनिर्भर

खुद ही तैयार करती है भूसा चेताली सेनगुप्ता ने बताया कि मशरूम उत्पादन के लिए पुआल को काट कर उसका भूसा तैयार किया जाता है। इसमें दो तरह का पदार्थ डाला जाता है, और पालीबैग में इसे डालकर तीन लेयर तैयार कर उसे 15 दिनों तक टांग कर रख दिया जाता है। फिर 15 दिनों के बाद उसमें थोड़ा पानी डाला जाता है। मशरूम उत्पादन के लिए भूसा, पालीबैग, कार्बेडाजिम, फार्मेलिन और स्पॉन (बीज) की जरूरत होती है। उन्होंने बताया कि तीन तरह के ढिगरी, बटन व मिल्की मशरूम का उत्पादन होता है। 10 हजार रुपये के बीज व अन्य सामान पर 15 हजार रुपये खर्च करने पर एक क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता है।

मशरूम में हैं कई गुण

सामान्य रूप से छत्तेदार खाद्य फफूंदी (कवक) को मशरूम या खुंभी कहते हैं। झारखंड में इसे लोग प्राय: खुखड़ी के नाम से जानते हैं। प्राय: मशरूम में ताजे वजन के आधार पर विटामिनों जैसे – बी 1, बी 2, सी, डी एवं खनिज लवण पाए जाते हैं। यह कई बीमारियों जैसे –खून की कमी, कैंसर, खाँसी, मिर्गी, दिल की बीमारी में लाभदायक होता है। इसकी खेती कृषि, वानिकी एवं पशु व्यवसाय संबंधी अवशेषों पर की जाती है तथा उत्पादन के पश्चात बचे अवशेषों को खाद के रूप में उपयोग कर लिया जाता है। उत्पादन हेतु बेकार एवं बंजर भूमि का समुचित उपयोग मशरूम गृहों का निर्माण करके किया जा सकता है। इस प्रकार यह किसानों, महिलाओं एवं रोजगार की तलाश कर रहे नवयुवकों के लिए एक सार्थक आय का माध्यम हो सकता
है।

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