पढ़ाई का दबाव और बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति

वर्तमान समय में माता पिता / अभिभावक दोनों ही अपने बच्चों को लेकर बहुत अत्यधिक महत्वकांक्षी हो गये हैं । पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन के लिए माता पिता बच्चों पर असामान्य रूप से दबाब डालते हैं । बच्चों में ऑल राउंडर गुणों की अपेक्षा करते हैं । विद्यालय में 5 से 12 वर्ष के बच्चों में भारी स्कूल बैग का चलन दिख रहा है । कम उम्र से ही माता पिता बच्चों को बोझिल कर रहे है । आजकल माता पिता प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में अपने बच्चों पर बाल्यावस्था से ही भिन्न भिन्न रूपों में दबाब बनाते दिख रहे हैं । माता पिता अपने बच्चों में अपने सपनों को पंख दे रहे हैं , जो अपने जीवनकाल मे नही पा पाये , उन्हें अपने बच्चों में देखने की जद्दोजहद के चलते बाल मन दबाब की स्थिति में जा रहे है । माता पिता / अभिभावक के अचेतन मन में दमित कैरियर बनाने की चाह बच्चों से पूरा करना चाहते और मनोवैज्ञानिक रूप से पढ़ाई का दबाब बनाये रखते , फलवरूप बच्चों में अन्तर्ध्वन्द की स्थिति , और अंततः आत्महत्या की ओर बच्चे बढ़ जाते हैं , बच्चे दबाब की स्थिति को झेलने की स्थिति में नही होते हैं । भारत में समाजीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है । शिक्षा वर्तमान समय मे छोटी उम्र के बच्चों से ही कष्टकारक हो रहे है । कम उम्र से स्कूल बैग का बोझ बढ़ता दिख रहा है । साथ ही साथ भारत की शिक्षा प्रतिस्पधात्मक हो गयी है , परिणाम को तरजीह दी जाने लगी है । बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन शिक्षा पद्धति से की जा रही है । आज पढ़ाई में लोगों का जुनून सवार दिख रहा है । छात्रों पर अच्छा प्रदर्शन , शीर्ष स्थान पाने के लिये दबाब रहता है , कई बार यह दबाब परिवार , भाई बहन , समाज के कारण होता है । छात्र पढ़ाई में अतिरिक्त धंटे खर्च करते हैं और मनोरंजन व समायोजन की गतिविधियों के लिए समय नही निकाल पाते हैं । इस प्रक्रिया के दौरान छात्र शिक्षा की चुनोतियों या विफलता को लेकर जरूरत से ज्यादा सचेत हो सकते हैं । यह विचारधारा मानसिक तनाव में वृद्धि करती है , अन्तर्ध्वन्द की स्थिति , व्यक्तित्व विकास बाधित होता है , अंतर्मुखी व्यक्तित्व पुष्पित पल्वित होने लगती है , संघर्ष की स्थिति देखी जाने लगती है , धीरे धीरे मधपान और मादक द्रव्य व्यसन के शिकार होकर नशे सेवन को जिंदगी का हिस्सा समझने लगते हैं । अत्यधिक निराशा , कुंठा , क्रोध की स्थिति जीवन से पलायन की इच्छा को प्रबल करने लगती है और इससे बचाव के लिये आत्महत्या कर डालता है । पढ़ाई का दबाब छात्र के अच्छे प्रदर्शन के लिये बाधक के रूप में

लेखक: डाॅक्टर प्रभाकर कुमार

सामने आती है । प्रत्येक व्यक्ति की सहनशीलता अलग अलग होती है , कुछ अच्छी तरह सामना कर लेते हैं कुछ सामना नही कर पाते हैं । उनके स्वभाव पर इसका अप्रत्यक्ष असर पड़ता है , ऐसे मे बच्चों में अत्यधिक भूख या भूख की अरुचि देखने को मिलती है । असमर्थता को लेकर भी छात्र तनाव से ग्रसित होने के साथ पढ़ाई बीच मे त्याग देते हैं , बदतर मामलों में तनाव से प्रभावित छात्र आत्महत्या का विचार मन में लाते हैं और बाद मे आत्महत्या कर लेते हैं । भारत में 15 से 29 वर्ष की उम्र के किशोरों व युवा वयस्कों के बीच आत्महत्या की दर सर्वाधिक है । परीक्षा में विफलता देश में होनेवाली आत्महत्यों के शीर्ष 10 कारणों में से एक है जबकि पारिवारिक समस्या शीर्ष 3 में है । शहरी इलाकों में अमीर व पढ़े लिखे परिवारों के युवा वयस्कों में आत्महत्या करने की प्रवृति अधिक होती है । पढ़ाई के लिये माता पिता का बच्चों पर अत्यधिक दबाब , बच्चों से अच्छे परिणाम की उम्मीद जो छात्रों के कौशल या हितों के अनुरूप नही होते हैं । कई मामलों में बच्चों के मन में आत्महत्या की भावना प्रबल नही होती है , माता पिता के अनुचित दबाब के चलते , बच्चों के अवरुद्ध पालन पोषण पद्धति , शुद्ध समाजीकरण प्रक्रिया के अभाव के चलते , देखभाल के सही तरीकों के अभाव के चलते बच्चों में पढ़ाई का दबाब आत्महत्या कर अपनी इहलीला समाप्त कर बाल मन खुशी का अनुभव करता है । महाराष्ट्र , तमिलनाडु जैसे राज्यों में माता पिता अपने बच्चों पर विज्ञान , गणित लेकर ही पढ़ाई करने को बाध्य कर देते हैं , उन्हें हर हालत में इंजीनियर , डॉक्टर बनाने की चाह सवार रहती है । बच्चों के वाणिज्य या कला में रुचि के विकल्प को नजरअंदाज कर दी जाती है । पढ़ाई में बच्चों से अत्यधिक माता पिता का हस्तक्षेप होने लगता है । महाराष्ट्र , तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश , पश्चिम बंगाल , मध्य प्रदेश में बच्चों पर पढ़ाई के दबाब के चलते आत्महत्या दर अधिक देखने को मिलती है । आत्महत्या के मनोवैज्ञानिक कारण – माता पिता के प्यार दुलार की कमी , पालन पोषण प्रणाली अवरुद्ध , शुद्ध समाजीकरण की प्रक्रिया का अभाव , माता पिता या परिवार की अपेक्षा या तिरस्कार व्यवहार , प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितिया , माता पिता या अभिभावक को बाल मनोविज्ञान के ज्ञान का अभाव , माता पिता को काउन्सलिंग की समुचित व्यवस्था , बच्चे के व्यक्तित्व विकास / अभिप्रेरणात्मक विकास / जीवन अवधि विकास के लिए कुशल प्रशिक्षण की अनुपलब्धता , मनोरंजन का अभाव , पारिवारिक स्नेह की कमी , पारिवारिक विघटन , बच्चों पर सोशल मीडिया का नकारात्मक प्रभाव , माता पिता / परिवार के साथ दोस्ताना संबंध का अभाव , माता पिता का बच्चों पर ध्यान नही दी जानी , बच्चों के व्यवहार को ठीक तरह से समझने का अभाव , सहानुभूति पूर्ण व्यवहार में कमी , सहयोग की कमी , माता पिता के नेतृत्व का अभाव ,दोषपूर्ण समाजीकरण , निराशा , अत्यधिक भावुकता , संवेगात्मकता , उन्माद , मानसिक दुर्बलता , कुंठा , निराशा , अत्यधिक संवेदशीलता , परीक्षा में असफलता , परीक्षा में अनुतीर्ण , प्रतियोगी परीक्षाओं में अनुतीर्ण हो जाना । मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड ने आत्महत्या के लिए मुख्य रूप से हीन भावना , घृणा व निराशा कारण बतलाए हैं । राष्ट्रीय अपराध अभिलेख व्यूरो कि रिपोर्टनुसार , आत्महत्या की वृद्धि दर 6.2% है जबकि वृद्धि दर 2.1% प्रतिवर्ष है । परीक्षा में असफलता आत्महत्या दर 1.7% है । भारत में आत्महत्या के तरीकों में ज़हर खा लेना , फांसी लगाकर झूल जाना , पानी में डूब जाना आदि है । वर्तमान समय मे पढ़ाई के दबाब में बच्चे रह रहे हैं , जो अंततः सुखद निवारण हेतु आत्महत्या की ओर बढ़ जाते हैं ।। पढ़ाई के दबाब से बच्चों को सुगम बनाने के उपाय – माता पिता / अभिभावकों की सकारात्मक चिंतन , बच्चों के दोस्त के रूप में / बच्चों के रॉल मॉडल के रूप में स्थापित हों , बच्चों को सांत्वना प्रोत्साहित करते रहे , सहायता के लिए सदैव तैयार रहे , परिश्रम शील / उत्कृष्ट ता का पाठ जरूरी , पर्याप्त मनोरंजन की व्यवस्था , परिवार का भी परामर्श जरूरी , मनोवैज्ञानिक की मदद लेते रहें , माता पिता की उच्च अपेक्षा को निम्न करना , पारिवारिक सामाजिक उलाहना को कम करना , बच्चों में रचनात्मकता को बढ़ाने – नृत्य , संगीत , कला , अन्य गतिविधियों उत्कृष्ट विकल्प के रूप में मौजूद , माता पिता की भी उचित परामर्श , बच्चों की भी कुशल व्यावसायिक लोगों से परामर्श , बच्चों की समझ को समझने की आंतरिक शक्ति को परिपक्व करना , कम उम्र में पढ़ाई का अनुचित दबाब से बच्चों को वंचित रखना , स्कूलों में भी शिक्षक बच्चों पर अनावश्यक अनुशासन के नाम पर कोमल हिर्दय वाले बच्चों पर दबाब न बनाये , बच्चों को एकाकीपन चिड़चिड़ा कमजोर धबरा ने नही दें , दूसरे बच्चों से तुलना न करें न ही बच्चों को बार बार परिणाम की उताहना न दे , सिर्फ पढ़ाई ही दुनिया मे सब कुछ नही अन्य विकल्प को भी माता पिता को बच्चों के व्यक्तित्व में शामिल करें ताकि बच्चों का समग्र सर्वांगीण उत्कृष्ट एवं चहुमुखी विकास हो पाये , बच्चों के परिपक्वता स्तर को बढ़ाने का कार्य समाजीकरण की प्रक्रिया के सभी लोगों के ऊपर निर्भर , बच्चों के भावनात्मक संबलता को मजबूत करना , अवसाद निराशा नकारात्मकता की जगह आशा का संचार उत्पन्न करना , बाल मनोविज्ञान का प्रयोग करना , बच्चों को धैर्यवान बनाना , पढ़ाई के समय बच्चों के पास बैठना , उनकी समस्या के बारे में चर्चा करना , प्रेम भरा व्यवहार बच्चों में अदम्य साहस का संचार करता है , बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान दी जानी , पढ़ाई का आसान तरीका बताना , बच्चों पर गुस्सा होने से पहले बच्चे की परिस्थिति को समझना , सब बच्चों के अपनी अपनी बौद्धिक योग्यता होती है / अंकों या कैरियर के लिए दबाब न बनाना , छात्रों की काउन्सलिंग होती रहे , माता पिता की काउन्सलिंग होती रहे , बच्चों पर हमेशा बेहतर प्रदर्शन का दबाब न हो , गृह कार्यों के लिए हमेशा दबाब न हो , माता पिता को प्रेरक व्यक्तित्व का धनी होने चाहिए , कुछ अन्य जीवन मे अनुतीर्ण या कैरियर में अनुतीर्ण लोगों की जीवनी को आत्मसात करवाते रहनी चाहिए ताकि बच्चों का बौद्धिक चातुर्य / विकास प्रगाढ़ होती रहे , बच्चों को योगा शारीरिक व्यायाम की दिशा निर्देश माता पिता को देते रहनी है , बच्चों की लगातार तुलना व शर्मिंदा करने की प्रवृति का त्याग जरूरी , बच्चों के प्रति पढ़ाई के परिणाम के आधार पर खराब व्यवहार नही करनी है अन्यथा मनोबल स्तर निम्न , दब्बू , अंतर्मुखी / बच्चे का व्यक्तित्व विकास के लिये बाधक आदि ।। वर्तमान समय में पढ़ाई के दबाब के चलते बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृति आसमान पर है । प्रतिदिन अखबार पत्रों से यह सुनने में आता है । माता पिता या परिजनों को ही यहाँ हम इस घटना के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार मानते हैं । समाजीकरण की प्रक्रिया के सभी कारक ऐसी घटना के जबाबदेह हैं क्योंकि बच्चों के स्वछ व्यक्तित्व निर्माण में इनकी भूमिका मुख्य है । कहीं बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं तो पूरी पालन पोषण प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह उठती है । अगर बच्चों में उदासीनता , असाधारण थकान ,भूख की अरुचि , अनिद्रा , अक्सर सिरदर्द , पेट में दर्द , जी मचलाना , नकारात्मता , अस्थिर मनोदशा , आक्रमकता , सामाजिक अलगाव , साथियों से बातचीत न करना , घबराहट , विद्रोह की स्थिति , धूम्रपान , नशीली दवाओं के सेवन , स्कूल मे बेकार घूमना , बंक मारना , कार्य छेत्र मे खराब प्रदर्शन , ध्यान केंद्रित न कर पाना , चिंता , डर , स्कूलों में अक्सर छुट्टी लेना , भावुकता से परिपूर्ण आदि की स्थिति बच्चों के मन में लगातार तनाव / अन्तर्ध्वन्द की स्थिति को प्रथम द्रष्टया प्रदर्शित करती है । बच्चों में तनाव की स्थिति शरीर में कार्टिसोल बनाता है जो धीरे धीरे अवसाद की स्थिति में ले जाता है और अत्यधिक होने पर आत्महत्या को अंजाम दिलवा देती है । माता पिता या समाजीकरण प्रक्रिया के दूसरे लोगों को बच्चों के बौद्धिक विकास के अनुसार एवं हमेशा सकारात्मक अभिव्यक्ति के साथ दोस्त बनकर उन्हें मार्गदर्शन देते रहने की जरूरत है ताकि बच्चों का संतुलित विकास हो पाये । आत्महत्या की घटना उपरांत माता पिता अपनी गलतियों को याद कर पछतावा करते हैं , जरूरत है इन पक्ष को अपने जीवन में आत्मसात करने की ताकि मधुर संबंधों के साथ बच्चों के विकास में दूरगामी सहायता अभिभावक गण पहुँचा सके और 21 वी शदी की इस घृनतं त्रासदी से हम सभी मुक्त हो पायें ।

लेखक: डाॅक्टर प्रभाकर कुमार

शिक्षाविद सह मनोवैज्ञानिक