महान स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल कय्यूम अंसारी को मोमिन कॉन्फ्रेंस ने भुला दिया

अब्दुल कय्यूम अंसारी ने साइमन कमीशन और भारत विभाजन का पुर जोर किया था विरोध: डा० फहीम अहमद

महेंद्र कुमार यादव

चतरा: महान स्वतंत्रता सेनानी एवं सामाजिक संगठन  मोमीन कॉन्फ्रेस के सूत्रधार अब्दुल कय्यूम अंसारी को उनके ही संगठन के लोगों ने भुला दिया। अब्दुल कय्यूम अंसारी एक व्यक्ति नहीं बल्कि अपने आप में एक संगठन थे।उन्होंने देश की आजादी में महती भूमिका निभाई और अपने लोगों के बीच में आजादी के प्रति जागरूकता फैलाने का काम करते रहे।उनकी कुर्बानी को आज भी इतिहास के पन्नो में देखा जा सकता है। अब्दुल कय्यूम अंसारी का जन्म 1 जुलाई 1905 को बिहार के ज़िला शाहबाद के कस्बा डेहरी आनसन में हुआ एक साधारण परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर हुआ। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने  कलकत्ता विश्वविद्यालय में नामंकन कराया और वहीं से उच्च  शिक्षा प्राप्त की।कोलकत्ता से ही उनके मन मस्तिष्क में अंग्रेजों के जुल्म व  बबरियत के खिलाफ शोला भड़क रहा था। देश को गुलामी से निजात दिलाने के लिए  आज़ादी की लड़ाई में वह उम्र के शुरूआती हिस्से में ही कूद पड़े थे। उन्होंने स्कूल से अपना नाम सिर्फ इस लिए  कटवा लिया था क्योंकि वह अंग्रेजी हुकूमत का था।होनहार बालक अब्दुल कय्यूम अंसारी ने  इतिहास रचने का ठान लिया। श्री अंसारी ने अपने कुछ सहपाठी एवं छात्रों के साथ मिलकर  एक विद्यालय का गठन किया। अंग्रेजों ने इसे हुकुम्मत के विरोध कार्य करने के जुर्म में  महज 16 साल की उम्र में उन्हें जेल जाना पड़ा। 1919 के खिलाफत आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाया।1920 मे राष्ट्रपिता गांधी जी के आह्वान पर बिहार राज्य से असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया। 1927 में साइमन कमीशन के भारत आगमन पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। 1937 – 38 में उन्होंने मोमिन आन्दोलन की शुरुआत की।1940 में उन्होंने मुस्लिम लीग की अलगावदी नीतियों व पाकिस्तान की मांग का जमकर विरोध किया। 1942 में उन्होंने गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग स्क्रीय रहे।1947 में उन्होंने भारत के बंटवारे का जमकर मुखालफत (विरोध ) किया और मुस्लिम समुदाय से अपील किया  की वह भारत छोड़कर पाकिस्तान न जाएं। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत वह बिहार सरकार में मंत्री बनाए गए। 1953 उन्होंने आल इंडिया बैकवर्ड क्लास कमीशन का गठन करवाया जो वाकई एक बड़ा कदम था। उन्होंने हमेशा देश के कमज़ोर वर्गों के उत्थान के लिए कार्य किया। वह भारत के हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। 18 जनवरी 1973 को इस महान् स्वतंत्रता सेनानी का निधन हो गया। 2005 में भारतीय डाक सेवा द्वारा उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया। श्री अंसारी हमेशा से टू नेशन थिअरी का विरोध करते रहे और मुस्लिम लीग को अलगाववादी संगठन आखरी समय तक कहते रहे उन्होंने हमेशा से भारत की एकता और अखंडता पर जोर देते रहे उन्होंने कहा था कि भारत माता की दो आंखें हिंदू और मुस्लिम है इसलिए दोनों आंखें हमेशा एक जैसी रहनी चाहिए ताकि देश की अखंडता और एकता पर कोई आंच न आए। प्रथम चुनाव में बिहार विधानसभा में मोमिन कॉन्फ्रेंस के कई नेता चुनकर इनके नेतृत्व में विधानसभा पहुंचे इनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने मोमिन कॉन्फ्रेंस को अपनी पार्टी में विलय कर सामाजिक सरोकार का संगठन बना दिया जो आज भी पूरे देश में एक समाज संगठन दबे कुचले पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए कार्य कर रही आज उसी मोमिन कॉन्फ्रेंस के कई नेता लोकसभा राज्यसभा विधानसभा विधान परिषद और कई राजनीतिक पद पर आसीन रहे लेकिन संसद और विधानसभा में पहुंचते ही महान स्वतंत्रता सेनानी और मोमिन कॉन्फ्रेंस के सूत्रधार अब्दुल कयूम अंसारी की कुर्बानी को भुला दिया गया।