हर किसी की सफलता की नींव में एक शिक्षक की भूमिका अवश्य होती है : रीतेश रंजन

हनवारा। सच्ची शिक्षा वह है, जो जीवन में से आती है और जीवन-भर साथ निभाती है। मनुष्य का पहला गुरु मॉं है, जिससे उसे संस्कार मिलते हैं। दूसरा गुरु पिता है, जो उसे व्यवहारिक ज्ञान और आचरण सिखाता है. तीसरा गुरु शिक्षक है, जो उसे व्यवहारिक ज्ञान की दहलीज तक पहुँचाता है। गुरु का काम मंजिल तक पहुँचाना नहीं, वरन उस राह को दिखाना है, जिस पर मनुष्य अपने पांवों चलकर मंजिल तक जा पहुँचता है। उसका कार्य प्रत्येक सवाल को हल करना नहीं है, वरन सवालों को हल करने की ऐसी विधि बताना है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझा सके।

जो लोग पढ़ाने का कार्य करते हैं, उनकी तीन श्रेणियाँ रही हैं. पहला प्राइमरी स्कूल के शिक्षक वे नन्हे बच्चे की अंगुली पकड़कर, उसे जीवन की मटमैली स्लेट पर उजले अक्षर लिखना सिखाते हैं. वे जीवन की जमीन पर पांव रखने वाले बालक को, पहली बार अज्ञान से ज्ञान की ओर , अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का काम करते हैं। उपनिषद में एक प्रार्थना है,’ हे प्रभु, हमें असत से सत की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले जा !’ उपनिषद की इस प्रार्थना को सही अर्थों में कार्यान्वित करने का श्रेय, प्राइमरी स्कूल के शिक्षक को ही है। वे अक्षर-विश्व से सर्वथा अपरिचित बालक को ज्ञानार्जन कराते हैं, इसलिए उन्हें ‘गुरु’ जैसे सर्वश्रेष्ठ संबोधन से पुकारा जाता है, किसी हाईस्कूल के शिक्षक या कॉलेज के प्रोफेसर को ‘गुरुजी’ नहीं कहा जाता।

दूसरे उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक होते हैं. उनका काम अज्ञान से ज्ञान की ओर या अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का नहीं, वरन बालक ने जिस ज्ञान को अर्जित कर लिया है, उसे बढ़ाने और परिष्कृत करने का होता है. वह ज्ञान देने से अधिक ज्ञान की ओर ले जाने का काम करते हैं, इसी से उन्हें ‘अध्यापक या प्राध्यापक’ कहा जाता है.

तीसरे कॉलेज के प्रोफेसर होते हैं. उनका काम इन दोनों से भिन्न होता है। वे ज्ञान की ओर ले जाने का नहीं, वरन ज्ञान की नई-नई दिशाएं खोजने का, प्रकाश और अधिक प्रकाश की खोज का काम करते हैं। वे ‘सर्च और रिसर्च’, खोज और अनुसंधान का काम करते हैं. चूँकि वे ज्ञान को आचरण में उतारने की दीक्षा देने वाले होते हैं, इसी से उन्हें ‘आचार्य’ कहा जाता है.

हर आदमी आज चरित्र-निर्माण और राष्ट्र निर्माण की बात कहता है लेकिन अगर कोई आदमी अपने समूचे जीवन के माध्यम से निरंतर राष्ट्र-निर्माण का कार्य कर रहें हैं, तो वह शिक्षक है. शिक्षक ही यह गर्व कर सकते हैं कि मेरा पढ़ाया वह छात्र आज वकील है, न्यायाधीश है, डॉक्टर है।

लेकिन इतना करने पर भी शिक्षक की आज समाज में प्रतिष्ठा नहीं है. आज समाज में वकील की प्रतिष्ठा है, डॉक्टर की प्रतिष्ठा है, नेता की प्रतिष्ठा है लेकिन अपने श्वास-प्रश्वास के साथ बच्चों के चरित्र निर्माण करने वाले शिक्षक की प्रतिष्ठा नहीं है। यह प्रतिष्ठा शिक्षक को स्वयं अर्जित करनी है. जो प्रतिष्ठा दी जाती है, वह छीनी भी जा सकती है, लेकिन जिसका अर्जन किया जाता है, वह गौरव बढ़ाने वाली होती है।
किसी भी व्यक्ति के प्रति प्रेम व्यक्त करने के चार माध्यम हैं – सम्मान, आदर, स्नेह और श्रद्धा। सम्मान व्यक्ति का नहीं, पद का किया जाता है. आदर उम्र में बड़ों का किया जाता है. स्नेह का संबंध बराबरी वालों से है. वह पारस्परिक आदान-प्रदान की वस्तु है. उसकी कोई सीमा नहीं होती.
श्रद्धा का संबंध गुण से है. जिसे हम श्रद्धा करते हैं, उसके प्रति हमारे मन में सम्मान, आदर और स्नेह की भावना रहती है. बिना सम्मान, आदर और स्नेह की श्रद्धा नहीं की जा सकती. उसमें तीनों का समन्वय होता है। जिसके जीवन की बेला में सेवा का फूल खिलता है, उसी के चरणों में श्रद्धायुक्त सम्मान का फल चढ़ाया जाता है . यह फल खाने के काम में नहीं आता, वरन बीज बनकर बोने के काम आता है, ताकि नयी-नयी बेलों में सेवा के नए-नए फूल खिल सकें।
शिक्षक श्रद्धास्पद इसीलिए माने गए हैं, कि उन्हें भी सम्मान की भूख नहीं सताती.