मेहंदी रचाने का भी हुआ बाज़ारीकरण

बोकारो से जय सिन्हा
बोकारो:भारतीय तीज त्योहारों में खाशकर करवाचौथ के मौके पर सुहागिन महिलाओ के हाथों पर मेहंदी रचाने की परंपरा रही है। पहले महिलायें अपने घरों मुहल्लों की महिलाओं से ही गीत संगीत के साथ महेंदी रचाती थी। लेकिन आज हालत बदल गए है अब ना संयुक्त परिवार रहा नही मुहल्लों का वातावरण आज सबकुछ का बाज़ारीकरण हो चुका है। अब बाज़ारो में भी मेहंदी रचाने वाले महेंदी आर्टटिस्ट जगह जगह आसानी से मिल जाते है। आज महिलायें 100 रुपयों से लेकर 1200 रुपये तक खर्चकर अपने हाथो पर डिज़ाइनर लुक देने में लगी है वही बाज़ारो में मौजूद केमिकल वाली महेंदी से सुर्ख लाल रंग की मेहंदी रचा रही है। आज की स्तिथी देख शायद वो शायर भी झेप जाय जिसने कभी लिखी थी रंग लाती है हीना पत्थर पर घीस जाने के बाद अब तो हीना का भी बाज़ारीकरण हो चुका है।