डायन प्रथा एक अंधविश्वास है, इसे जागरूकता के माध्यम से खत्म किया जा सकता है: डीसी

महिला बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग के तत्वावधान में डायन कुप्रथा उन्मूलन हेतु एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

गुमला: नगर भवन में महिला बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग के तत्वावधान में डायन कुप्रथा उन्मूलन हेतु एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन सम्पन्न हुआ। कार्यशाला में मुख्य रूप से डायन कुप्रथा को कैसे रोका जा सके इस संबंध में लोगों को जागरूक करने पर जोर दिया गया।

कार्यशाला में उपायुक्त गुमला शिशिर कुमार सिन्हा ने अपने संबोधन में कहा, डायन प्रथा एक अंधविश्वास है जो समाज के लिए अभिशाप है। यह एक ऐसी कुप्रथा है जिससे पूरा राज्य प्रभावित है, इस अभिशाप से गुमला जिला भी अछूता नहीं है। हमें ऐसी कुरीतियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से आज इस कार्यशाला का आयोजन किया गया है। उन्होंने कहा किन कारणों से लोग महिलाओं को डायन घोषित करते है, इसका पहचान करना आवश्यक है। उन्होंने कहा इसमें गरीब महिलाओं को ही डायन बताकर प्रताड़ित किया जाता है। इस पर उपायुक्त ने कहा लोगों में शिक्षा का अभाव होना प्रमुख कारणों में से एक है। जागरूकता के माध्यम से इस कुप्रथा को अंत किया जा सकता है। एक ओर जहां मनुष्य आज अंतरिक्ष की यात्रा कर रहा है, विज्ञान के नए-नए आयाम को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारे राज्य में प्रचलित डायन प्रथा हमारे समक्ष एक प्रश्न चिन्ह है।
उपायुक्त ने कहा अशिक्षा के कारण हमारे समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा मिल रहा है। शिक्षा एवं जागरूकता से ही इस कुप्रथा को समाप्त किया जा सकता है। ऐसी सामाजिक कुरीति पर अंकुश लगाने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता बेहद जरूरी है। ऐसी कुरीतियां ना केवल महिलाओं बल्कि समाज को भी नकारात्मक विचारधारा से ग्रसित करती हैं। इन कुरीतियों से महिलाओं को प्रताड़ित करना अपराध है। डायन बिसाही जैसी कुप्रथा के कारण आज समाज की गरीब तथा असहाय महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। यह केवल सरकार या प्रशासन ही नहीं बल्कि राज्य के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेवारी है कि डायन-बिसाही प्रथा को जड़ से उखाड़ने में अपना योगदान दें। ऐसी कुप्रथा से ना केवल महिलाओं में बल्कि समाज में भी नकारात्मक विचार धारा बन रही है। डायन उन्मूलन जागरूकता सेमिनार को हम सभी को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम अपने किसी भी कार्य, शब्द या रीति से कार्रवाई करने वाले को तीन महीने तक कारावास की सजा या 1000 रुपये जुर्माना अथवा दोनों से दंडित करने का प्रावधान है, साथ ही उपायुक्त ने बताया यदि किसी महिला को डायन के रूप में पहचान कर उसे शारीरिक या मानसिक यातना देने या प्रताड़ित करने पर 6 महीने की अवधि के लिए कारावास की सजा या 2000 तक के जुर्माना या दोनों सजा से दंडित करने का प्रावधान है।
झारखंड को डायन नामक कलंक से मुक्ति दिलाने का बीड़ा जिन चंद संस्थाओं और लोगों ने उठाया है, उनमें छुटनी देवी का नाम सबसे ऊपर है। यह वही छुटनी हैं, जिन्हें समाज के लोगों ने डायन बता प्रताड़ित किया था। छुटनी देवी को 25 साल पहले डायन बताते हुए गांव-घर से निकाल दिया गया था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी, अंधविश्वास और इस कुप्रथा के खिलाफ निरंतर अभियान चलाती रही। छुटनी देवी न सिर्फ इस कुप्रथा के खिलाफ अभियान चला रही हैं, बल्कि अपने सामर्थ्य और निजी खर्च से प्रतिदिन 15-20 गरीब और डायन प्रथा से पीड़ित महिलाओं को अपने घर पर भोजन भी कराती हैं। झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिला अंतर्गत गम्हरिया प्रखंड के बीरबांस गांव की छुटनी देवी को इस वर्ष पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है।
उपायुक्त ने उपस्थित सभी लोगों से अपील की कि इस विषय को लोगों तक पहुंचाएं और लोगों को जागरूक करें क्योंकि हमारे लिए विकास के इस दौर में डायन-बिसाही जैसे मामलों को भी खत्म करने की चुनौती है। डायन के नाम पर महिलाओं को प्रताड़ित करना एक अशिक्षित समाज को दर्शाता है। आप अपने-अपने गांव, प्रखंड में जाकर लोगों के बीच यह जागरूकता संदेश दे कि डायन बताकर महिलाओं या उनके परिवार को मारना या प्रताड़ित करना दंडनीय अपराध है।

कार्यशाला में उप विकास आयुक्त संजय बिहारी अम्बष्ठ ने अपने संबोधन में कहा डायन प्रथा/ अंधविश्वास/ झाड़-फूँक जैसे कुरीतियों का सम्पूर्ण उन्मूलन ही इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा अंधविश्वास की जड़ें ग्रामीण क्षेत्रों में गहराई तक बैठी है। समाज की वैसी महिलाएं जो विधवा, असहाय हैं, उन्हें ही डायन के रूप में चिन्हित कर प्रताड़ित किया जाता है। मूल रूप से अशिक्षा इसका मूल कारण है। उन्होंने आगे कहा कि शिक्षा एवं साक्षरता के प्रसार से इसके उन्मूलन की दिशा में हम सक्षम हो सकते है। उन्होंने कहा ग्राम सभा तथा नुक्कड़-नाटक के माध्यम से भी इस कुप्रथा का उन्मूलन किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि गुमला, खुँटी, सिमडेगा, चाईबासा जैसे जिले अति प्रभावित क्षेत्र है। उन्होंने उपस्थित लोगों से गाँवों में स्वच्छता, साफ-सफाई को बढ़ावा देंने पर बल दिया। साथ ही उन्होंने लोगों से अंधविश्वास के चक्कर में न पड़ने व बीमार होने पर अपने निकटतम स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर अपना ईलाज करवाने की अपील की।

वहीं कार्यक्रम में सदर अनुमण्डल पदाधिकारी रवि आनन्द ने कहा शिक्षा, स्वास्थ्य, जागरूकता के माध्यम से ही इस कुप्रथा को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने एएनसी कर्मियों की सहभागिता को महत्वपूर्ण बताया। अनुमण्डल पदाधिकारी ने कहा गाँव के अशिक्षित लोगों को इस कुप्रथा के प्रति जागरूक करना महत्वपूर्ण है।

कार्यशाला में आली फाउंडेशन की रेषमा ने अपने संबोधन में कहा, आली द्वारा सभी प्रकार की हिंसा से पीड़ित/प्रताड़ित महिलाओं की सहायता हेतु कार्य किया जाता है। उन्होंने कहा आली फाउंडेशन विगत 10 वर्षों से झारखण्ड में कार्यरत् है। जिला समाज कल्याण विभाग गुमला के साथ आपसी समन्वय स्थापित कर लगातार गुमला जिले से डायन कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में रणनीति बनाकर कार्य किया जा रहा है।

कार्यशाला में डालसा के अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विनोद कुमार ने कहा, जिला विधिक सेवा प्राधिकार द्वारा भी डायन कुप्रथा उन्मूलन हेतु कई कार्य किए जाते है। उन्होंने डायन कुप्रथा के विषय में कहा कि प्राचीनकाल से यह कुप्रथा प्रचलित है। 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान भी आदिवासी बहुल इलाकों में कमजोर विधवा महिलाओं को निशाना बनाते हुए प्रताड़ित किया जाता था। उन्होंने कहा कि हमे एकजुट होकर इस कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में कार्य/रणनीति बनाना होगा। अशिक्षित लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। उन्हें शिक्षित कर इस कुप्रथा के प्रति जागरूक करें। शिक्षा के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में साफ-सफाई, स्वच्छता, चिकित्सकीय परामर्श आदि के प्रति जागरूक कर डायन प्रथा जैसी कुरीति को समाप्त करने में सहायता मिलेगी। साथ ही उन्होंने लोगों को डायन कुप्रथा के लिए निर्धारित सुसंगत धाराओं की भी जानकारी देने पर जोर दिया।

कार्यशाला का स्वागत भाषण देते हुए जिला समाज कल्याण पदाधिकारी गुमला सीता पुष्पा ने कार्यशाला आयोजन के मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। साथ ही कहा डायन प्रथा जैसी कुरीति से उत्पन्न होने वाली हिंसा को रोकना अति महत्वपूर्ण है। उन्होंने सभी को मिलकर इस अंधविश्वास को गुमला जिले से हटाने की दिशा में कार्य करने/रणनीति बनाने की आवश्यकता बताई।
कार्यशाला में जिला पशुपालन पदाधिकारी, पुलिस निरीक्षक (मानव तस्करी विरोधी) अरूण कुमार ने भी कार्यशाला को संबोधित किया तथा डायन कुप्रथा को रोकने संबंधी आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता बताई। इसके पश्चात् उपायुक्त द्वारा डायन प्रथा उन्मूलन से संबंधित जागरूकता पोस्टरों का अनावरण किया गया।

कार्यशाला में उपस्थिति
कार्यशाला में उपायुक्त शिशिर कुमार सिन्हा, उप विकास आयुक्त संजय बिहारी अम्बष्ठ, सदर अनुमण्डल पदाधिकारी रवि आनन्द, डालसा के अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी विनोद कुमार, जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ0 मोहम्मद कलाम, जिला समाज कल्याण पदाधिकारी सीता पुष्पा, आली फाउंडेशन के प्रतिनिधि रेषमा, पुलिस निरीक्षक (मानव तस्करी विरोधी) अरूण कुमार, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी, महिला पर्यवेक्षिकाएं, सेविका/ सहायिका, जेएसएलपीएस के प्रतिनिधि, पुलिस प्रशासन व अन्य मौजूद थे।