विश्व बाल श्रम निषेध दिवस

विचार

बच्चे किसी देश / समाज के अमूल्य संपति हैं जिनकी समुचित सुरक्षा , पालन पोषण , शिक्षा व विकास का दायित्व भी राष्ट्र व समुदाय आधारित होता है । कालांतर में यही बच्चे देश के निर्माण व राष्ट्र के उत्थान के आधारस्तंभ बनते हैं ।

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार , भारत में बाल मजदूरों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है । भारत में अनुमानतः बाल श्रमिकों की संख्या 440 लाख से 1000 लाख तक है , अधिकृत रूप से इसकी संख्या 17.5 लाख बतलायी है । कुल बाल श्रमिकों का 30 % खेतिहर मजदूर , 30 – 35 % कल कारखानों में कार्यरत , शेष पत्थर खदानों , चाय की दुकानों , ढाबों , रेस्टोरेंट व घर के कार्यों में लगे हुए हैं एवं गुलामों जैसा जीवन जी रहे हैं ।

योजनाओं , कल्याण कार्यक्रमों , कानून व प्रशाशनिक गतिविधियों के होते हुए भी विगत दशकों में अधिसंख्यक भारतीय बच्चे संकट व कष्ट के दौर से गुजर रहे हैं , उनके सरंक्षक उन्हें शोषित करते हैं तथा रोजगार देने वाले लोग उनका लैंगिक शोषण भी करते हैं यधपि भारत में बच्चों के भावनात्मक , शारीरिक व लैंगिक शोषण की समस्या बढ़ती ही जा रही है । इन परिस्थितियों में मनोवैज्ञानिकों व समाज के निर्माताओं को भी बाल श्रम कुरीति पर आगे बढ़कर ध्यान दिए जाने की जरूरत ।

समाज के सभी वर्ग , सरकार व बच्चों के समग्र विकास में कार्यरत सभी संस्थानों व हितधारकों की यहाँ समन्वित रूप से आगे आकर बाल श्रम जैसे वैश्विक मुद्दे को मुक्त करने हेतु गंभीर समस्या के रूप में स्वीकार करना होगा तभी व्यापक स्तर पर समुचित समाधान की परिदृश्य दिखलाई देगी ।

बच्चे राष्ट्र के अमूल्य निधि हैं , बच्चों की सम्पूर्ण सुरक्षा प्रदान करना एवं इनके मनोसामाजिक , आर्थिक व नैतिक मूल्यों के विकास का दायित्व केवल उनके परिवारों का ही नहीं , जहाँ ये बच्चे जन्म लेते हैं बल्कि उस समाज व देश का भी है जहां ये बच्चे बड़े होते हैं , रहते हैं । बाल श्रमिकों के शोषण की यह परंपरा अनादि काल से चली आ रही है , अभी भी समाज में एक मानवीय कलंक के रूप में व्याप्त है ।

विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर एक संकल्प लें कि बाल श्रम मुक्त समाज व राष्ट्र की संकल्पना को मूर्त अभिव्यक्ति की ओर हमारा श्रेष्ठ प्रयास हो । विश्व व देश स्तर पर समाज समुदाय का हर वर्ग इस वैश्विक समस्या के निराकरण मे अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन अपनी जवाबदेही स्वरूप ।

लेखक: डॉ प्रभाकर कुमार
उपर के वक्तव्य लेखक के अपने हैं।