पर्यावरण संरक्षण के प्रति कृतज्ञ बनें न कि कृतध्न

विचार

आज विश्व पृथ्वी दिवस , 22 अप्रैल 2021 के अवसर पर यह कृत संकल्प लें कि प्रकृति से मिलनेवाली निःशुल्क वातावरणीय पहलुओं के प्रति कृतज्ञ बनें न कि कृतध्न । जल , वायु , नीर जो जन्म से निःशुल्क प्राप्त कर रहे हैं उनके प्रति दया की भावना नैसर्गिक रूप से व्यक्तित्व में विधमान हों । पेड़ पौधे समष्टि व ब्रह्मांड में उपस्थित चीजो के प्रति हम जवाबदेह बनें , उन्हें सरंक्षण दें , पुष्पित पल्वित भी करें ताकि यह चक्र चलती रहे । प्रदूषण मुक्त , प्लास्टिक मुक्त समाज निर्मित हो एवं हरीतिमा हरियाली परिवेश का सृजन हो । सबों की सामूहिक प्रतिबद्धता की जरूरत । पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कृतज्ञ बनने की जरूरत । इस धरा पर निःशुल्क मिलनेवाली अनमोल जल , जलवायु , शुद्ध हवा , परिवेश के प्रति हमें कृतध्न रवैया को दूर कर हरीतिमा को बचाने में आगे आने की जरूरत ।

लेखक: डाॅक्टर प्रभाकर कुमार

21 वी शदी मे नैसर्गिक प्रकृति में गिरावट दर्ज हो रही है । व्यक्ति लगातार प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं । पेड़ , पौधे व हरीतिमा धीरे धीरे विलुप्त होते होते जा रहे हैं । घरती के गर्भ में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों , खनिज संपदा के उपयोग में व्यक्ति इतना लिप्त हो गये है कि पर्यावरण की नैसर्गिक छटा घुमिल होती दिख रही है । एक तरफ नगरीकरण , औधोगिकरण का तेजी से जाल फैल रहा है , गावो से शहरों में पलायन विकास को लेकर बदस्तूर जारी है पर आधुनिकता शैली ने पर्यावरण सरंक्षण पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर विभिन्न पर्यावरण असंतुलन को जन्म दिया है । व्यक्ति को राष्ट्रीय चरित्र के रूप मे पर्यावरण सरंक्षण का व्यक्तित्व में समावेश हो , इस पर बल दिये जाने की जरूरत है ।

21 वी शदी मे पर्यावरण सरंक्षण व असंतुलन दोनों को समझने की जरूरत है क्योंकि पर्यावरण सरंक्षण एक चुनौती पूर्ण कार्य है । विश्व स्तर पर जागरूकता बढ़ी है क्योंकि जिस तरह विकासशील देशों में विकास की गति देखी जा रही है , आधुनिकता की होड़ देखी जा रही है , पेड़ पौधे की अन्धानुध कटाई और विनाश की जा रही है इस अनुपात में पेड़ लगाए नही जा रहे हैं । पेड़ का काम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कर शुद्ध ऑक्सीजन देने का है पर पेड़ो की कटाई शुद्ध हवा मिलने में अवरोध का कार्य कर रही है । साथ ही प्रदूषण भी वैश्विक स्तर पर देखी जा रही है , नित्य नए कल कारखाने , उधोगों को बढ़ावा दी जा रही है , चिमनियों का धुवां से हवा प्रदूषण , कचरों से जल प्रदूषण , गाड़ियों से ध्वनि प्रदूषण बहुतायत मात्रा मे देखी जा रही है । जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि एक तरफ जारी है दूसरी तरफ लगातार धरती पर उपलब्ध सीमित संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है ।

पर्यावरण का लगातार निष्क्रिय रूप से दोहन ने कई तरह के असंतुलन को जन्म दिया है जिनमे बाढ़ , भूकंप , अमल वर्षा , नदियों का सूखना , कुएं में पानी न होना , जल संकट , फसल चक्र प्रभावित , जलवायु परिवर्तन , जैव विविधता में तीव्रता से ह्रास , वैश्विक ताप बढ़ना , समुद्र तल बढ़ना , छोटे द्वीप डूबना , तटवर्ती शहरों में पानी होना , चट्टानें का डूबना , कचरा बढ़ना , जल प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण , बढ़ती जनसंख्या , शहरीकरण , औधोगिकरण , जंगल का नष्ट होना , पर्यावरण ह्रास , जैव विविधता में कमी , मिट्टी की उर्वर शक्ति नष्ट , संसाधन रिक्तीकरण , प्राकृतिक खतरे बढ़ना , चक्रवात आना , भूगर्भ जल स्तर कम होना , पानी समस्या , भूमि प्रदूषण , मानवकृत विभीषिकाये बढ़ना , धरती का गर्म होना , पिघलते ग्लेशियर , जीवन के अस्तित्व के लिये संकट , ग्रीन हाउस गैसों का प्रदूषण बढ़ना , आपदाओं मे वृद्धि , सूखा , अकाल , प्रलयकारी बाढ़ , सुनामी , गर्म हवा चलना , जगलो का नष्ट होना , जीव जंतुओं व दुर्लभ प्रजातियां नष्ट , अरब के रेगिस्तानो में भारी वर्षा , ओजोन परत मे छिद्र , फसल चक्र प्रभावित , ग्रीन हाउस गैसों का प्रदूषण , वायुमंडल का तापमान बढ़ना , नाभिकीय यंत्रों के अत्यधिक प्रयोग से विभिन्न तरह से प्रदूषण वृद्धि , जलवायु परिवर्तन , बेमौसम गर्मी बरसात , कृषि की पैदावार प्रभावित , जलस्तर नीचे जा रहा , असंगठित औधोगिकरण , भुमि छरण , अवैध तरीको से पत्थरो की तोड़ना , डायनामाइट विस्फोट , व्यक्ति के स्वास्थ्य में नुकसान , शरीर की प्रतिरोधक छमता मे कमी , प्रजनन शक्ति मे कमी , पुरूषों में नपुंसकता, ग्लोबल वार्मिंग , खाद्य समस्या , उत्तरजीविता पर प्रश्नचिन्ह , कृषि समस्या , खाद्य सामग्रियों मे पौष्टिकता व खनिज पदार्थों का अभाव , सरीसृप जीव जंतुओं का नाश , मस्तिष्क प्रदूषण , यौन असंक्रमन , लिंग हार्मोनल असंतुलन , महिलाओं में बांझपन , पुरुषो मे नपुंसकता आदि देखे जा रहे हैं ।

पर्यावरण सरंक्षण के असंतुलन के लिये कई मनोवैज्ञानिक प्रभाव हैं जिनमें व्यक्ति के मस्तिष्क के सोचने समझने की शक्ति की कमी , बौद्धिक अवरूद्ध ता , अवसाद , निराशा बढ़ना , भय डर आदि संवेगों मे परिवर्तन , ध्यान की कमी , संज्ञानात्मक क्रियाओं में बाधा , शरीर की चयापचयी क्रियाओं मे बाधा , अंतःस्रावी ग्रंथियों यथा हामोन्स उतार चढ़ाव , तनाव में वॄद्धि , मृत्यु की तरफ बढ़ने वाली बीमारियों का जन्म , निराशा , एकाग्रता कमी , असाध्य बीमारियों का होना , कैंसर , शरीर मे ऑक्सीजन की कमी , समयोजनात्मक समस्याये का बढ़ना , निर्णय अयोग्यता , चिड़चिड़ापन , व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास अवरुद्ध होना , कृषि उत्पादन में बाधा , खाद्य पदार्थों की समस्या , अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि , सामाजिक संरचना में बदलाव , मानसिक मंदता वृद्धि , अभिप्रेरणात्मक स्तर निम्न , नकारात्मक चिंतन वृद्धि , मन के गत्यात्मक पक्ष इड , ईगो व सुपर ईगो के बीच असंतुलन , मन के आकारात्मक पक्ष चेतन , अर्द्धचेतन व अचेतन के बीच असंतुलन , कुंठा व द्वद्व मे वृद्धि , प्रतिबल व समायोजन विकृति , मनोरचना प्रतिरक्षा रचनाएं बाधा – दमन , रूपांतरण , उदातीकरण , युक्ताभास , प्रतिगमन , प्रतिक्रिया निर्माण , विस्थापन , प्रछेपन , आत्मीकरण , अन्तःचेपन, छतिपूर्ती , प्रत्याहार , वास्तविकता अस्वीकरण , दैनिक जीवन की मनोविकृतिया भूले मे वृद्धि , स्वप्न बाधा , मनोलैंगिक विकास से संबंधित बाधा , चिंता विकृति , लैंगिक विकृतियां , शीलगुण विकृतियां , व्यक्तित्व विकृतिया , निद्रा विकृति , विकासात्मक विकृतियों , आवेग नियंत्रण विकृति , मनोदैहिक विकृतियों आदि का जन्म पर्यावरण असंतुलन का परिणाम होती है । व्यक्ति आरोयगता को खोकर रुग्णता की ओर बढ़ते हैं , नकारत्मकता की ओर प्रवृत्त होते हैं ।
पर्यावरण सरंक्षण को 21 वी शताब्दी के लिये चुनौती पूर्वक माना जा सकता है । वैश्विक स्तर पर एकजुटता के साथ विश्व के सभी राष्ट्रों को इसपर ध्यान दिये जाने की जरूरत है ताकि पर्यावरण सरंक्षण को बढ़ावा दिया जा सके । भविष्य मे जलवायु परिवर्तन को सुधारा जा सके , जल संकट को कम किया जा सके , तभी पृथ्वी पर उत्तरजीविता का सरंक्षण सम्भव है , पर्यावरण सरंक्षण के बिना विनाश तय है । पूरी दुनिया इसके चपेट मे आ सकती है और महाविनाश तय है अतः पेड़ पौधे का सरंक्षण अनिवार्य रूप से हो , जल की प्रचुरता बनी रहे । सेमिनार में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि जल बचाओ , देश बचाओ । पेड़ लगाओ , पेड़ बचाओ , यही स्वस्थ समाज के सृजन का आधार । पर्यावरण सरंक्षण का नारा , प्रत्येक व्यक्ति की जवाबदेही ।

शरीर का निर्माण पंच तत्व के संयोजन से हुआ है जिनमें भूमि , गगन , वायु , अग्नि व नीर का समावेश है । प्रकृति के यह पंच तत्वों की रक्षा करना व्यक्ति के आवश्यक निमित्त होनी चाहिये , तभी पर्यावरण सरंक्षण सही मायने में चरितार्थ हो सकती है । यह पंच तत्व के सरंक्षण मे समाज के हर वर्ग को आगे आने की जरूरत है , पर्यावरण पर सभी की जिंदगी आधारित है अतः सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ संकल्पित प्रयास से वैश्विक स्तर पर एकजुट प्रयास करने की जरूरत है । सभी व्यक्तियों को संकल्प लेने की जरूरत है कि प्रकृति के सरंक्षण मे हम अपना बेहतर दे पाये , जो मेरे हाथों में है । विश्व स्तर पर अतुल्य समृद्ध समाज निर्माण तभी सरंक्षण की ओर अग्रसर हो पाएगी जब पर्यावरण सरंक्षण व इसके सभी चुनौती पर हम पर्याप्त ध्यान दे पाएं ।

विश्व गुरु के रूप में हमारी ख्याति तभी बन सकती है जब हम पर्यावरण को सुरक्षित रख पाये । प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन मे 05 पेड़ लगाने का संकल्प लें और जल की बर्बादी न करने का संकल्प भी । साथ ही प्लास्टिक के उपयोग को पूर्ण रूप से वर्जित करें ताकि पर्यावरण को सुरक्षित रख पाएं । व्यक्तियों को आगे आकर समाज के पुनर्निर्माण मे अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन करनी होगी ।

पर्यावरण सरंक्षण की परस्पर जबाबदेही जनसंख्या के सभी लोगों मे बराबर की जरूरत । सूचना प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता भी पर्यावरण असंतुलन की मुख्य जवाबदेही , बतलाया । जिस तरह से व्यक्ति इंटरनेट , कंप्यूटर , टेलीविजन , मोबाइल , एक्स रे आदि पर निर्भर हुआ है , कई तरह की अल्ट्रा वायलेट तरंगे व्यक्ति को रुग्ण बना रहे हैं और व्यक्तित्व प्रभावित हो रहे हैं । विज्ञान पर अत्यधिक निर्भरता व्यक्ति को पंगु और बीमार भी बना रहा है । इसपर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है । पर्यावरण सरंक्षण व इसके असंतुलन को रोकने , कम करने मे विश्व के प्रत्येक हितधारकों की परस्पर भूमिका की जरूरत है तभी वैश्विक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन की रुपरेखा देखी जा सकती है ।

लेखक: डाॅक्टर प्रभाकर कुमार

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