व्यक्तित्व निर्माण

विचार
बच्चों को शिक्षित करने का मुख्य उद्देश्य बच्चों के व्यक्तित्व का संतुलित विकास करना है जिससे उनमें शारीरीक , मानसिक , सांवेगिक , नैतिक व चारित्रिक विकास हो पाये ।

इन सभी उद्देश्य में आनुवंशिकता के साथ साथ शुद्ध वातावरण का हाथ होता है जिसमें माता पिता , अभिभावक , परिवारजन एवं समाजीकरण की प्रक्रिया के सभी कारकों की जबाबदेही होती है । सर्वप्रथम बच्चों के परिपेक्ष्य में स्वच्छ वातावरण के निर्माण में घर में माता पिता / अभिभावक को रोल मॉडल बनकर बच्चों के अनुकरणीय प्रतिमान बनने चाहिए ।

किसी भी व्यक्ति के संतुलित व्यक्तित्व निर्धारण में आनुवंशिकता और वातावरण की अन्तःक्रिया दोनों की परिणाम होती है । समाज के लिए लोकोपकारी एवं सृजनात्मक व्यक्तित्व निर्माण में घर की प्रथम पाठशाला के शिक्षक ( माता पिता ) की अद्वितीय भूमिका होती है ।

किसी भी बच्चे के लिये प्रथम पाँच वर्ष उनके पूरे जीवनकाल के व्यक्तित्व का निर्धारण कर देती है इसलिए माता पिता / घर के प्रतिमान की जबाबदेही बनती है कि सृजनात्मक वातावरण से बच्चों को रूबरू करवायें । शिष्ट होना , मृदुभाषी , शुद्ध संस्कार का अनुकरण ,सच्चरित्र होना जीवन के लिए अति आवश्यक ताकि व्यक्ति के व्यक्तित्व का नैसर्गिक विकास हो , व्यक्ति अपनी परिसीमाओं के अंदर व्यवहार मर्यादा पूर्ण ढंग से कर पाएं , शास्वत और आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में संकलित करते हुए !

लेखक: डाॅ प्रभाकर कुमार
उपर के वक्तव्य लेखक के अपने हैं।