बोकारो के इस मंदिर में देवियो का प्रवेश है वर्जित

बोकारो से जय सिन्हा
बोकारो: बोकारो ज़िले के कसमार प्रखण्ड में मंगला देवी का मंदिर है जहां देवियो का ही मन्दिर में प्रवेश वर्जित है , है न अजीब बात एक तरफ नारी शशक्तिकरण की बात तो दूसरी तरफ यह सच्चाई। बोकारो जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर कसमार प्रखंड की टांगटोना पंचायत के बगियारी स्थित मां मंगल चंडी देवी मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। मंगल चंडी मंदिर परिसर में प्रत्येक मंगलवार को पूजा अर्चना होती है, जिसमें दूर दूर से सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं। महिलाएं भी थाली में फूल प्रसाद लेकर पूजा करने पहुंचती हैं, लेकिन उन्हें मां मंगल चंडी की प्रतिमा के पास नहीं जाने दिया जाता। महिलाओं के लिए मंदिर परिसर में ही लगभग 100 फीट की दूरी पर एक सीमा निर्धारित कर दी गयी है। यह सीमा है कसमार के बगियारी स्थित मां मंगल चंडी मंदिर और मंदिर के सामने बना गेट। ऐसी मान्यता है कि मंदिर में होने वाले
बकरे की बलि देख ले या मंदिर के अंदर सीमा रेखा के भीतर प्रवेश करे तो अनहोनी की घटना घटित हो जाती है। कहा जाता है कि काफी समय पहले एक बार एक महिला अज्ञानता के कारण मंदिर परिसर में प्रवेश कर पूजास्थल के पास चली गयी थी, तो बाद में उस महिला के साथ एक दुर्घटना घटी और वह पागल हो गयी थी। इसके बाद देवी माता ने पुजारी को स्वप्न में आकर मुख्य मंदिर से दूर एक दूसरा मंदिर पूजा के लिए निर्मित करने की बात कही। इसके बाद मंगलचंडी मंदिर परिसर में ही एक
दूसरा मंदिर भी बनवाया गया है। इस मंदिर में प्रत्येक मंगलवार को पूजा अर्चना होती है, जिसमें बोकारो, रामगढ़, धनबाद समेत पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के श्रद्धालु अपनी अपनी मन्त पूरी करने और मन्नत मांगने मंगलचंडी मंदिर पहुंचते हैं। इस मंदिर में पूजा के बाद बकरे की में बलि के बाद बकरे का सिर (मुंड) मंदिर के बगल में हो जमीन में गाड़ दिया जाता है। साथ ही बकरे का प्रसाद रूपी मांस मंदिर परिसर में ही पका कर खाना है, जिसमें सिर्फ पुरुष ही शामिल हो सकते हैं।
रेखा के बाहर ही महिलाएं पूजा की थाली लेकर खड़ी हो जाती हैं, पंडित या पुजारी आकर महिलाओं से पूजा की थाली लेकर मंदिर जाते हैं और पूजा करवा प्रसाद लेकर कर महिलाओं को दे देते हैं। इसके बाद महिलाएं दूर से ही देवी को प्रणाम कर अपने अपने घर लौट जाती हैं महिलाओं की पूजा अर्चना के लिए सिर्फ सीमा रेखा ही नहीं, बल्कि समय भी निर्धारित किया गया है। दोपहर 12 बजे से पहले ही वे पूजा अर्चना के लिए मंदिर परिसर में आ सकती हैं।
दोपहर 12 बजे से पहले ही पूजा करवा कर वे मंदिर परिसर से हर हाल में वापस लौट जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि 12 बजे के बाद माता मंगल चंड़ी की विशेष पूजा के बाद बकरे की बलि प्रारंभ होती है, इस बलि को देखना महिलाओं के लिए निषिद्ध है। महिलाएं न तो बकरे की बलि देख सकती हैं न हो बकरे की न बलि के बाद प्रसाद रूपी मांस ग्रहण कर सकती हैं। सिर्फ पुरुष ही बकरे का प्रसाद रूपी मांस ग्रहण कर सकते हैं। इसके पीछे की क्या मान्यता है यह किसी को नही पता लोग सिर्फ इतना जानते है यह परम्परा वर्षो से चली आ रही है जिसका निर्वाहन आज भी हो रहा है।