धान की उन्नत खेती के लिए कम अवधि वाली प्रजातियों का करें चयन

– किसानों के लिए खाद्य एवं पोषण विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी संपन्न

गोड्डा: गुरुवार को ग्रामीण विकास ट्रस्ट-कृषि विज्ञान केंद्र गोड्डा के सभागार में आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में “किसानों के लिए खाद्य एवं पोषण” कार्यक्रम पर आॅनलाईन सेमिनार एवं किसान गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत ऑनलाइन के माध्यम से केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर एवं केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी के द्वारा की गई।वरीय वैज्ञानिक सह-प्रधान डाॅ रविशंकर ने किसानों से कहा कि भारत का खाद्यान्न उत्पादन 302 मिलियन टन, दलहन 28 मिलियन टन तधा तिलहन 32 मिलियन टन उत्पादन हो रहा है। फिर भी महिलाओं एवं बच्चों में कुपोषण की समस्या दिखाई पड़ रही है। इससे बचाव के लिए बायोफोर्टीफाइड प्रजातियों का चयन करके कुपोषण से निजात मिल सकती है। धान की उन्नत खेती के लिए कम अवधि वाली प्रजातियों जैसे-सहभागी, सबौर अर्द्धजल, बिरसा विकास धान, राजेन्द्र श्वेता आदि का चयन करना चाहिए। जिससे कि रबी मौसम में दलहनी एवं तिलहनी फसलों को चुनाव करके उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सके ताकि फसल क्षेत्र को बढ़ाया जा सके। जिला कृषि पदाधिकारी डाॅ रमेश चन्द्र सिन्हा ने बताया किसूक्ष्म सिंचाई प्रणाली सामान्य रूप से बागवानी फसलों में उर्वरक एवं पानी देने की सर्वोत्तम एवं आधुनिक विधि मानी जाती है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में कम पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जाती है। इस प्रणाली में पानी को पाइपलाइन के माध्यम से स्रोत से खेत तक पूर्व-निर्धारित मात्रा में पहुंचाया जाता है। इससे पानी की बर्बादी को तो रोका ही जाता है। साथ ही यह जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में भी सहायक है। देखने में आया है कि सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाकर 30-40 फीसदी पानी की बचत होती है। इस प्रणाली से सिंचाई करने पर फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता में भी सुधार होता है। सरकार भी ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के मिशन के अंतर्गत फव्वारा, टपक सिंचाई पद्धति को बढ़ावा दे रही है। किसान गोष्ठी के तहत धान परती भूमि का क्षेत्रफल पूर्वोत्तर भारत में करीब बारह मिलियन हेक्टेयर भूमि रबी मौसम में कोई फसल नहीं ली जाती है।इसका मुख्य कारण धान की लम्बी अवधि की प्रजातियों का चुनाव, मृदा नमी की अनुपलब्धता के कारण दूसरी फसल किसान नहीं ले पाते हैं, जिससे कि पूरे साल का फसल का उत्पादन कम हो जाता है। इसका सही विकल्प परती भूमि पर चना, मटर, मसूर, तीसी, सरसों को लगाकर किसान अपनी भूमि का पूर्ण उपयोग करके अधिक से अधिक लाभ ले सकते हैं।