आदिवासी बहुल गांव में पानी की विकराल समस्या!

बोकारो से जय सिन्हा
बोकारो:  झारखण्ड का निर्माण इस उद्देश्य हुआ कि लंबे समय उपेक्षित रहे आदिवासियों को जल जंगल जमीन का असली हक़ मिलेगा जब झारखंड एक अलग राज्य बनेगा। लम्बे समय तक आदिवासियों को लेकर विभिन्न रजनीतिक अपनी राजनीति भी करते रहे। प्रदेश गठन के 20 वर्ष बाद भी आदिवासियों की क्या दशा है, चलिए हम उससे आपको रूबरू कराते है। ज़िले के
गोमिया प्रखंड के सीयारी पंचायत स्थित जिलिंग टाड  के ग्रामीण आज भी चुआ के पानी पीने को विवश  है. बता दें कि तेनुघाट अनुमंडल  अंतर्गत गोमिया प्रखंड का यह आदर्श गाँव    सियारी के जिलिनंग टाड टोला  के करीब दर्जनों घर के निवासियों को पीने के पानी तो दूर रोजमर्रा के पानी के लिए मिलो दूर जाकर रेल्वे पटरी किनारे चुआ से  पानी भरकर लाना पड़ता है. तब जाकर कहीं इनकी प्यास बुझती है. ग्रामीणों ने बताया कि गांव के करीब ना तो कोई कुआं है और ना ही कोई चापानल पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं होने की वजह से हम ग्रामीणों को रेलवे साइडिंग में बने एक चुआ से पानी लाना पड़ता है. तब जाकर कहीं हम लोगों के घर में खाना बनाना और पीने का व्यवस्था हो पाता है..आजादी के 70 बाद भी दलित आदिवासी बहुल गांव पानी की विकराल समस्या से लोग त्रस्त हैं..जबकि जिला प्रशासन ने उक्त गांव को आदर्श गांव की उपाधि से नवाज रखा है यही नही इसी प्रखण्ड में आदिवासियों के अंतरराष्ट्रीय तीर्थस्थल लुगू बुड़ु घण्टा बड़ी में करोड़ो खर्च कर अंतर्राष्ट्रीय पर्यटक स्थल बनाने की प्रक्रिया भी जारी है लेकिन वही तलहटी में रहनेवाले इन आदिवासियों का सुध लेने वाला कोई नही ना स्थानीय प्रशासन और ना जनप्रतिनिधि।