इस गांव के पांच हजार आबादी मुख्य सड़क से कटी है, लोग रेलवे के कच्ची मार्ग से गुजरने का हैं विवश

बोकारो से जय सिन्हा

बोकारो: गोमिया प्रखंड के स्वांग पुराना माइनर्स और गंझूडीह गांव के लगभग पाँच हजार से अधिक आबादी के लिए मुख्य सड़क नहीं है। वे रेलवे के जानलेवा कच्ची सड़क से आवाजाही करने को मजबूर हैं। दरअसल गोमिया प्रखंड के स्वांग कोलयरी का पुराना मायनर्स और गंझूडीह गांव रेलवे लाईन के उत्तर दिशा में बसा है। यह इलाका गोमो बरकाकाना रेलखंड के बोकारो थर्मल और गोमिया स्टेशन के बीच अवस्थित है। स्वांग पुराना माइनर्स और गंझूडीह गांव के लोगों को बाजार से लेकर रोजमर्रे की जिंदगी से गुजर बसर के लिए मुख्य सड़क पर जाने से पहले होकर उक्त रेलवे लाइन के किनारे जानलेवा कच्ची सडक मार्ग से होकर गुजरना पड़ता है।इसके अलावा गोमिया एवं आसपास के लोग बोकारो थर्मल प्लांट एवं गोविन्दपुर परियोजना में काम करने के लिए तथा बोकारो थर्मल से गोमिया एवं आसपास के इलाके में आने जाने के लिए यही एकमात्र रास्ता है। दरअसल गोमिया से बोकारो थर्मल जाने के लिए कोई मुक्कमल मुख्य मार्ग नही है। अलबता खतरनाक मार्ग होने के बावजूद भी लोग इसी रास्ते से आवगामन को मजबूर हैं।जल जमाव से रेल को भी है खतरागोमिया बोकारो थर्मल रेल खण्ड के बीच गंझूडीह के निकट पोल संख्या 4417 से लेकर 4506 तक रेलवे लाइन के किनारे की इस सडक पर कई छोटे छोटे तालाब नुमा गड्ढा बन गया है। यह जल जमाव वर्षा के कारण रेल लाइन के उत्तर छोर से रेलवे ट्रैक के अन्दर ही अन्दर पार हो कर जमा हो जाती है। रेलवे के किनारे इन गड्ढों की मरम्मति नही होने के कारण लगभग पांच सौ मीटर की इस सडक मेंदर्जन भर गड्ढे बने पड़े है फिर भी इसकी सुध लेने वाला कोई नही। दोपहिया वाहन चालक जान जोखिम में डालकर भी अपनी यात्रा तय करते हैं।सड़क नहीं है लेकिन रेलवे ने भूमिगत मार्ग बना दियारेलवे ने पोल संख्या 4417 और 4506 के बीच आवागमन के लिए भूमिगत मार्ग बना दिया, लेकिन करीब पांच सौ मीटर कच्ची सड़क को नहीं बनाती है। जबकि रेलवे का जमीन होने के कारण राज्य सरकार या पंचायती राज व्यवस्था के तहत भी पक्की सडक नहीं बन पाती है। लिहाजा जानलेवा गड्ढों के रास्ते ही लोग अपने गंतव्य तक जाने को विवश हैं।जनप्रतिनिधियों का भी नहीं है ध्यानइतनी बड़ी आबादी को मुख्य सड़क नहीं है, वे जानलेवा सड़क से गुजरते हैं, और मुख्य सड़क तक पहुँचते है। इसकी चिंता जनप्रतिनिधियों को भी नहीं है। लिहाजा लोग अपनी किस्मत पर आंसु बहाने को को मजबूर है। शायद रेल और स्थानीय प्रशासन को किसी हादसे का इंतज़ार है।